सड़क किनारे फटे-पुराने कपड़ों में,
फुटपाथ पर, अक्सर लोग मिल ही जाते हैं...

बहुत ही कम लोगों को, वह 
आम लोग ,कम नजर आते हैं...

हमारे जूते-चप्पल सिल-सिल कर, 
वह गरीब रोज की दो, रोटी कमाते है...

दो रोटी कमाने के लिए, 
पेट की आग ,बुझाने के लिए...

 मन के विपरीत ,
 कार्य करने के लिए ,मजबूर हो जाते है...

और हम मध्यमवर्गीय ,लेन-देन में
भाव तय करते हैं,
और हम आम लोग ही ,
एक-एक पैसे का, मोल भाव करते हैं...

हम अक्सर भूल जाते हैं,
दोस्तों में ,रिश्तेदारों में ,हम दिल 
खोलकर पैसा खर्च करते हैं...

और बस उन्हीं लोगों से, और 
अपने निजी घर में ,एक-एक
 पैसे का हिसाब रखते हैं...

सड़क किनारे सब्जी के, मोल भाव 
बारीकी से तय करते हैं,
और स्टैंडरी कपड़ों की, दुकान में
 फिक्स रेट के कपड़े लेकर आ जाते हैं...

आप जब अपने वॉलेट,
 से पैसे गिनते हो साहिब...

एक गरीब की निगाहें, छुप-छुप कर,
उस पैसे को ,बड़ी ही गहराई से देखती है...

कभी-कभी कल्पना मात्र, करके सोचती हैं
 काश इसमें से ,एक सौ रुपया हमारा होता...

उसी सौ रुपए से, उसका नमक-दाल
आता है,
एक फुटपाथ का गरीब ,भीख नहीं मांगता
भूख से मरना जानता है पर,
हाथ फैलाना नहीं जानता...

हम क्या जानते हैं, क्या नहीं...?
यह तो बस भैया आंख बंद करके,
कुछ पल अपने आप से पूछो...?

कभी दगा धोखे में ,असहाय-निर्धन
गरीब को, कभी मजदूरी करके
कभी जूते चप्पल सिलकर...

कभी सब्जी बेचते हुए,
कभी पेन ,अगरबत्ती बेचते हुए...

सुबह-सुबह ब्रेड ,अखबार बेचते हुए,
कई बार देखा होगा साहिब...

उसकी भी दो आंखें होती है,
 उन आंखों में कुछ उम्मीदें होती है...

जैसे तैसे छोटा-मोटा उनका,
आय का जरिया होता है...

जैसा तुम्हारा सवेरा होता है,
उसका भी सवेरा होता है...

फर्क बस इतना है साहिब,
आप मल-मल के बिस्तर पर सोते हैं...

वह फटी-पुरानी चादर पर 
बेफिक्री से सोता है...

सड़क किनारे फटे-पुराने कपड़ों में,
फुटपाथ पर अक्सर ,लोग मिल ही जाते हैं...

✍️लक्ष्मीनारायण ठाकुर

      देवरी कलां
 जिला सागर मध्य प्रदेश।🙏