क्या लिखूं मैं!
कविता के विषय में,
जानती नहीं में कुछ,
इसे विस्तार में।
शब्दों की न्यूनता सताती है,
बैठूं लिखने मैं जब कविता।
छंद , दोहे का ज्ञान नहीं,
मात्रा दोष भारी पड़ता।
पीड़ा छटपटाती अंतर में,
हृदय उद्वेलित होता है।
मन के अंतर भावों का,
बवंडर अक्रमित होता है।
उकेरना चाहती हूं जब मैं,
मन के अपने उद्गारों को।
लेखनी मेरी विस्मित होती,
सूझा क्या इस अनाड़ी को।
अपनी इस विवशता पर,
आक्रोश बहुत हो जाता है।
शून्यता मेरी आड़े आती,
अज्ञानता खड़ी चिढ़ाती है।
अपनी इस बेवसी पर,
आत्मग्लानि हो आती है।
कविता लिखने की इच्छा,
मन में धरी रह जाती है।
कविता समझाती है मुझको,
तुम इतना न मन व्यथित करो!
जो भाव हृदय से उद्गमित हो,
बस सरल रूप में प्रस्तुत करो।
मुझे न चाहिए दोहे,छंद
न चाह भारी भरकम शब्दों की।
तुम जो कुछ भी लिखो ,
वो हो तुम्हारी ही अभिव्यक्ति।
स्नेह लता पाण्डेय
नई दिल्ली

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