प्रेम ही पूजा और प्रार्थना है,
ईश्वर की आराधना और स्व की साधना है,

वृक्ष की डालियां थिरकती है
क्यूंकि समर्पित है पवन को ।

मेघ करते है आलिंगन और
बरस जाते है पर्वतों पर ।

पुष्प पूरित है मुस्कुराहट से
क्यूंकि भंवरे के प्रति अनुरक्त  है।

धरती और चांद का प्रणय 
असीमित अगणनीय है।

प्रेम है, तभी प्रकृति है,जीव हैं
और असंख्य संभावनाएं हैं


        @साधना सिंह