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भावुक हूं थोड़ी सी, संवेदनशील सी है,
नारी हूं मैं दिल से गहरी झील सी हूं,
हर माहौल में ढल जाती सहनशील सी हूं,
थोड़ी सी जिद्दी थोड़ी सुशील सी हूं,
ग्रीष्म की तपती धूप में शीतल छांव सी हूं,
शरद में उगते सूरज की गर्माहट सी हूं,
अंधेरों में जलते चिराग सी हूं,
चिरागों की लौ बेहिसाब सी हूं
तन से थोड़ी कोमल सी---
इरादों में मगर चट्टान सी हूं,
शायर की गजल में बेमिसाल सी हूं,
प्रेम की प्रतिमा कमाल सी हूं,
पारिवारिक वंश बेल की माली हूं,
हर दिन में होली हूं,रात में दिवाली सी हूं
तरु की टहनी पर खिलते फूल सी हूं,
फूलों की रक्षा करती शूल सी हू,
मंदिर की आरती, मस्जिद की अजान सी हूं,
ग्रंथों में गीता और कुरान सी हूं,
हर एक कुल की मर्यादा---
हर दिल में एक वादा सी हूं,
हर धर्म का मान हूं मैं ईमान सी हूं,
हर रिश्तो में पनपता अभीमान सी हूं,
भावुक हूं थोड़ी सी संवेदनशील सी हूं
नारी हूं मैं दिल से गहरी झील सी हूं।
संगीता वर्मा✍✍

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