अतःकरण जब शुद्ध होता है
तब अंतर्मन स्वच्छ होता है
जीवात्मा में बसी आत्मा तो
श्वेत,धवल,निर्मल सी होती है
इस चराचर में आकर ही
अपवित्र, दूषित  होती है
समय की गर्द जब चढ़ती है
अंतर्मन तब मैला होता है
जब अतःकरण शुद्ध होता है
तब अंतर्मन स्वच्छ होता है
निर्मल चित्त का असर
 सब पर कुछ यूँ पड़ता है
पावन ह्रदय से निकला हर शब्द
मन- मस्तिष्क पर घर कर जाता है
इससे अतःकरण निर्मल
विकार रहित हो जाता है
अतःकरण शुद्ध तब होता है
जब अन्तर्मन स्वच्छ होता है
पावन आत्मा पुष्प जैसी होती है
सुगंध जिसकी स्वतः फैलती है
सच्चाई,सदभाव, जग- कल्याण से
जो जग को सुवासित करती है
उस पावन चित्त में सिर्फ
सत्कर्मों की ललक होती है।।


         आशा झा सखी