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मैंने अपने रिश्तो को---
 कुछ देर से पहचाना,
 भूल गई थी--- 
खुद को मैंने कभी न जाना,
 माहिर हूं आता है---
मुझे खुद को बहलाना,
रखती थी रिश्तो की--- 
मर्यादा उन्हें बचाने में,
 भूल गई खुद को---
 खुद से अनजाने में,
 ख्वाहिशें पूरी हुई या ना हुई---
सब्र बेहिसाब रखती हूं,
 देखती हूं एक सपना---
 जब मैं कभी
 आईना दिल का
 मैं साफ रखती हूं।


              संगीता वर्मा