सदियों से
कुचले जाते
इस जीवन की सच्चाई क्या है
क्या उस सच्चाई तक कभी नजर गई है तुम्हारी
नहीं न
तुम्हारी नजर में तो
सिर्फ और सिर्फ एक जिस्म हूँ मैं
जिसको गिद्धों की तरह नौंचना ही तो
तुम्हारा मनोविनोद रहा है सदियों से
उफ क्या स्त्री होना मेरे लिए अभिशाप है
उफ
कब बदलेगी तुम्हारी यह बहशी सोच
कभी सोचा है
तुम्हारी जठराग्नि के ईंधन के लिए
मैं ही तो तुम्हारे हल को अपने सीने पर रखती हूँ
तुम्हारी तृषा पूर्ति के लिए
मैं ही तो नदी बन बह उठती हूँ
तेरे जीवन में रंगीनियाँ भरने को
मैं ही फिज़ां सी बिखर जाती हूँ
कहीं समां बन तेरे जीवन को रोशन करती हूँ
तो तेरे जीवन को मंगलमय करने हेतु
मैं ही अपने अस्तित्व को मिटा
पंचरचित अमृत कलश जैसा
एक कुलदीपक प्रदान करती हूँ
और तेरे तपते जलते जीवन की खुशहाली के लिए
मैं ही तो चाँदनी सी बिखर जाती हूँ
और तेरी ओर बढ़ती अशुभ की आशंका से
रणचंड़ी सी बिफर उठती हूँ
मगर तुमने कब समझा है मेरा अस्तित्व
मेरा स्त्रीत्व
मैं एक रुप नहीं
कोई रंग भी नहीं
न कोई आस ही हूँ
और मैं कोई प्यास भी नहीं
हूँ तो बस अहसास
गर तू महसूस कर सके तो ।
देवयानी भारद्वाज
उसायनी फीरोजाबाद

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