हे मन, ठहर रुक सुन समझ
आखिर क्या तू चाहता है
क्यों पल-पल बदलता है
क्यों तिल - तिल तरसाता है
भूत - भविष्य में ही जीवन बीता
वर्तमान तो रह गया रीता
आस और काश में आहें भरते
जीवन अपना ढोते रहते 
आंसुओं से ही हम अपने
तन को भिगोते रहते ।

हे मन, ठहर रुक सुन समझ
आखिर क्या तू चाहता है
हर पल को भरपूर जी ले
हर क्षण को मुट्ठी में पकड़ ले
आज ही है बस तेरा
जो करना है अभी तू कर ले
यादों से बाहर निकल
हाय और आहों को विदा कर
जोर से खिलखिला कर हंस
बस यही अपना फर्ज समझ ।

                धनु दयाल