मुझे गुस्सा आ गयी थी वरना नहीं बोलती मैं।
ग़लत नही सहन होता।
राज़ दिलों के नही खोलती मैं।
सहन करती हूँ जब तक सहा मुझसे जाता है।
टुट जाए सब्र का बांध ।
फिर ज्वालामुखी बन जाता है।
नहीं चलाती मैं जुबान ताला लगाकर रखती हूँ।
कोशिश करती हूँ दबाकर ।
अपने जज़्बात रखतीं हूँ।
टूटकर बिखर गयीं ना जाने कितनी बार बार मैं।
लेकिन अब समेटकर ।
अपने हवाई सपनों में जीती मैं।
कोई हो तो हो गुस्सा परवाह करना छोड़ दिया।
जब से भरा साहस जीवन में ।
हमने हँस के जीना सीख लिया।
नीलम गुप्ता 🌹🌹(नजरिया )🌹🌹
दिल्ली

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