मैं गीत विरह के गाती हूँ।
दर्द हृदय संगीत सजाकर
छिद्रों को जग के अपनाकर।
जीवन को बाँसुरी बनाकर
मधुर मधुर धुन गाती हूँ।।
पतझड़ से नीरस जीवन में
कँटक कदमों की सींवन में।
अँखियों में सावन अपनाकर
मुक्ताहार लुटाती हूँ।।
जलते जीवन की बाती से।
स्वाँसों की अनुपम थाती से।
मंगल आरति थाल सजाकर
पी पी टेर लगाती हूँ।।
देवयानी भारद्वाज

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