बुराई पर अच्छाई की विजय की प्रतीक होली सदियों से जला रहे हैं परन्तु वह आज तक नहीं जल सकी है।
कश्यप ॠषि के द्वितीय पुत्र हिरण्यकशिपु अर्थात् अतिशय धन लोलुप प्राणी, जिसने जन्म लिया उत्तम कुल में तत्पश्चात कठोर तप (कठिन परिश्रम) के बल पर अपार शक्तियों का स्वामी भी बन गया। परिणामस्वरूप राजस के वशीभूत होकर, दुर्भावनाओं की पोटली- बहिन होलिका का सहारा लेकर प्रह्लाद अर्थात् आह्लाद प्रदायक को, अतः आह्लाद को मिटाने का पुरजोर प्रयास करने लगा।
आज दुर्भावनाओं की ढेर होलिका, आह्लाद (प्रह्लाद) को मिटाने के लिए सम्पूर्ण शक्तियों के साथ प्रयासरत है। परन्तु नियति, कि जो जन -जन के सुख के लिए तत्पर हो, उसका विनाश आसुरी शक्तियों द्वारा कैसे सम्भव है? अत: दुर्भावनाओं का अन्त हुआ। परन्तु अहं रूपी हिरण्यकशिपु अभी भी शान्त नहीं था। उसका विनाश तो कोई मानव, दानव या पशु किसी भी समय विशेष -दिन -रात, स्थान विशेष -पृथ्वी -आसमान आदि में कैसे कर सकता था? उसका अन्त तो कोई ऐसा दिव्य प्राणी ही कर सकता है जिसमें सत् -असत् का समावेश हो, जो मानवत्व और पशुत्व के गुणों से परिपूर्ण हो। अत: सभी शर्तों को मद्देनजर रख आज नृसिंह रूप ने संध्या समय, भवन की दहलीज पर, पृथ्वी -आकाश के बीच, अपनी जंघाओं पर रख, अपने नखों से उदर विदीर्ण कर, अन्त कर दिया और संसार में प्रसन्नता का प्रसार किया ।
देवयानी भारद्वाज

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