ऊब भरे इस व्याकुल मन में
लेकर आस बहार की ।
देख रही हूँ पल पल छिन छिन
डग दक्षिणी बयार की ।।
शिशिर और पतझड़ आते हैं
पर बसन्त खुशहाल नहीं ।
आतप नितप्रति बदन तपाये
सावन की मस्त फुहार नहीं।
कोयल की वह कूक नहीं ,आती आवाज कराह की ।।
पावस जैसी मनहर रितु में
नहा रहे पक्षी रजकन में ।
आसमान बदरंग हुआ है
उदासीन सा व्याकुल मन में ।
याद शेष पावस की उस कोमल पायल झनकार की ।।
रहा नहीं मातृत्व जननि में
बच्चों का बचपन है खोया ।
नई सदी की संध्या पर है
स्वाभिमान जन जन का सोया।
अब पुनः जरूरत आन पड़ी है जामवंत ललकार की ।।
काँप रही अचला थर थर है
जर्जर गात हुए जरजर ।
मुक्त केश फिर सिसक उठे
चूनर तन से सरके सर सर ।
रेशमी कलम के चित्रकार भूले आवाज दुधार की।।
देवयानी भारद्वाज

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