रास नहीं आता है , मुझको तेरा यूं बदल जाना !
कभी कुर्सियां टूटी-फूटी फूटी धूमिल दर्पण चमकाना !
फटे- पुराने, जैसे -तैसे चारपाई मांग के लाना !
कभी उधारी कर तुम बढ़- चढ पकवान बनाते हो!
सूखी रोटी सूने में प्याज मिर्च संग खाते हो !
फटी पुरानी बिस्तर चादर मलमल ऊपर से बिछाना !
रास नहीं आता है मुझको तेरा यूं बदल जाना !
तृप्त कर सुधा स्वयं तुम मिथ्या डकार जगाते हो!
खुद भूखे रहकर हमें तुम छप्पन भोग खिलाते हो!
भाभी जी विदुर सा स्नेह भावनाओं में बह जाना!
मित्रता की पावन दहलीज कोई तुमसे सीखे निभाना !
जाते वक्त हमें तुम वह शब्द फिर आना यूं कह जाना !
निर्धन मेरा मित्र सुदामा आस वही फिर से आना!
रास नहीं आता है मुझको तेरा यूं बदल जाना !
कभी किसी दिन हाट बाजार पर फिर से मुलाकात हो जाना !
हाल-चाल परिचय जानकर वह प्रेम की चाय पिला जाना !
कर तुम देते हिसाब किताब सब मुस्कुराहट के जाना !
मैं जैसा हूं तुम जैसे हो व्यर्थ क्यों बदल जाना !
स्वीकार सभी मित्र भाव तुम्हारे तुम जैसे ही हो जाना !
चाय पान का रिवाज बनाकर आवभगत बढ़ती जाना !
बना रहे यह रिश्ता हमारा वक्त पर वक्त साथ निभाना !
रास नहीं आता है मुझको तेरा यूं बदल जाना !
विरले मिलते मित्र तुम जैसे दिल का खजाना लुटा जाना !
एक-एक पल तुम्हारे घर का मानो मंदिर में आ जाना !
आय का जरिया जैसे-तैसे खेती मजदूरी करके लाना !
अथक परिश्रम देख तुम्हारा निशब्द मेरा हो जाना!
थके हारे जब तुम घर आते मुस्कान के शब्द कह जाना !
आवभगत क्या हुई तुम्हारी कब आए कह जाना!
रास नहीं आता ही मुझको तेरा यूं बदल जाना !
आएंगे पर आते नहीं क्या बात है तुम बता जाना !
रास नहीं आता है मुझको तेरा यूं बदल जाना!
नमस्कार दोस्तों ।
✍लक्ष्मीनारायण ठाकुर...
सागर मध्य प्रदेश से🌷

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