हे, प्रभू विनती तू सुन ले
कर कृपा,मुझपे भी तू
पापियों के इस जंजाल में 
मैं भी,जकड़ा जा रहा
हे,प्रभू विनती......


अंधेरों की दूनियाँ से दूर कर हमें
सद्ग्यान का मार्ग,दिखादे तू
अमृत की वाणी,तू पिला दे 
दुर्गुणों से बाहर,आ जाऊँ मैं
हे, प्रभू विनती......


करुँ नाम मैं भी,तेरे इस जग में
जिससे तू मुझसे प्रसन्न हो
चरणों में तेरे,सर झुकाऊँ
सब पाप मेरा,'धूमिल' हो
हे,प्रभू विनती......




     लेखक:-विकास कुमार लाभ
                    मधुबनी(बिहार)