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एक और दिन दर्ज हुआ कल,, अभिलाषा के पन्नो पर"
नव निर्मित ,इतिहास रचा फिर,शब्दो के हथकन्डो पर"
न कुछ ,बदला,न बदलेगा,,शर्तो की बुनियादो पर"""
जब तक कमर नही कस लोगे,वहम भरे अपवादो पर""
कितना खोया कितना पाया,व्यर्थ समय गवाते हो""
नेकदिलो ,पर दोष लगाकर,दूर खडे मुस्काते हो"""
पहले वादा कर लेते हो,जन्मो जन्म निभाने का""
समयचक्र के वार से डर ,पीडा फिर भूलाने का"""
न तुम बदले न मै बदली,फिर कैसे हम गैर हुऐ"
गलत सही के चक्कर मे,हम कैसे निर्मूल हुऐ"""
दिल अब भी वही थडकता,बस एक पीडा नई मिली"
पहले ,मुस्काती थी आँखे,अब आँसुओ की भीड मिली"
कुछ तो पीडा है उर मेअब,मन मै न हिचकोले है"
वेदना,से भरा हुआ मन,न खुशियों के मेले है"
होठो पर मुस्कान है नकली,आँखो मे मायूसी है"
खुद को ही अर्पण कर देती ,फिर अबला बन रोती है"
हे,नारी अब खुद को समेट,पँख मिले है"बँधे हुऐ"
शिव सी गरल विष पी ले,कई निशाने सधे हुऐ"""
रीमा ठाकुर (लेखिका)
रानापुर -झाबुआ-मध्यप्रदेश -भारत

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