पाषाण ,नजर आँऊ तुमको.अब दग्ध ह्रदय है मेरा"
जब बीच सफर मे छोडा था,स्वाभिमान भर पल था मेरा"
कभी चाँद सी ,उपमा दी मुझको ,कभी शीतलता का नाम दिया"
कितने सपने बिखरे टूटे,,,, जब उसी ,चाँद को दाग दिया"
जब मर्यादा का भय था तुमको,क्यू अलिगँन मे पाँश लिया"
कितनी हसरतें जुडी तुमसे"फिर क्यू परलक्षित कर ही दिया"
अब न कोई सवाल करना"अब कोई जबाव नही मेरा""
पलको ,के सूख चुके अश्रु"जब ह्रदय,व्याथित कर ही दिया"
अब अच्छा है,हम भी बिखरे"पर तुम भी बहूत ही टूटे हो"
अपमान के भँवर जाल मे फस"कुछ अपनो ने परित्याग दिया""
अब सांसो मे झंकार नही ,पहले जैसा कुछ आज नही""
किस्मत के पन्ने भरे हुऐ,जब कोई न स्थान दिया""""""
रीमा ठाकुर (लेखिका)
रानापुर "झाबुआ -मध्यप्रदेश

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