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कितने दर्द छुपे इस उर मे"
पल पल उनको ढूँढ रही हूँ"
सूख न जाऐ जख्म कही न"
हर पल उन्है कुरेद ,रही हूँ"""
बिन उद्देश्य,चल रही साँसे"
खुद से रिश्ता,तोड रही हूँ"य
भूल सकूं पिछली बाते मै"
सबसे मुहँ मै,मोड रही हूँ"""
शब्द बाण से है, मन  घायल"
अश्रु के बन्धन ,तोड रही हूँ"
छल प्रपंच मे पडकर मै"
प्रेमपथ भी छोड रही हूँ""
क्षमा मुझे,करना,त्रिगुणमयी"
खुद से बन्धन,तोड रही हूँ"
बसे हो ,मन मे चैतन्य से""
मन शाश्वत से जोड रही हूँ"""
धरा को सौप,पंचतत्व अपना"
अपना सब कुछ ,छोड रही हूँ"""



रीमा महेन्द्र ठाकुर'(लेखिका)
रानापुर,झाबुआ ,मध्यप्रदेश,भारत✍️🏻🙏🏼