स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारतवर्ष को एक 'सेक्यूलर स्टेट'घोषित कर दिया गया है। तथा तब से यह शब्द लोगों की ज़बान पर इतना चढ़ गया है कि क्या बड़े-बड़े नेता और क्या गांव-गांव, गली-गली में बातचीत के स्वर को ऊंचा करके ही भाषण की हवस मिटाने वाले छुटभैये सभी,दिन में चार बार 'सेक्यूलर स्टेट'की दुहाई देकर अपनी बात मनवाने का तथा दूसरों को उसके विरूद्ध बताकर गलत सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। सुनते-सुनते यह शब्द तो कानों में रह गया है, किन्तु अभी तक यह स्पस्ट नहीं हो पाया है कि भारत सरकार, बोलनेवाले नेता तथा सुनने वाली जनता 'सेक्युलर' शब्द का क्या अर्थ समझती है।
सेक्यूलर के लिए भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त प्रयासों से यह भिन्नता स्पष्ट हो जाती है। अलौकिक,धर्महीन, धर्मरहित,धर्मनिरपेक्ष, अधार्मिक, अधर्मी, निधर्मी, असाम्प्रदायिक आदि अनेक शब्दों का सेक्यूलर के पर्याय रूप में प्रयोग होता है।
निश्चित ही उपर्युक्त सभी शब्द समानार्थक नहीं हैं। उनमें मत भिन्नता ही नहीं है अपितु वे विरोध की सीमा रेखा को भी स्पर्श कर जाते हैं। राज्य के स्वरूप के संबंध में इतना वैषम्य वास्तव में हितावह नहीं है। अच्छा हो कि हम सेक्यूलर शब्द का अर्थ ठीक से समझ ले,कम से कम जिस अर्थ में हम भारत को सेकुलर स्टेट बनाना चाहते हैं,उसका निर्णय कर ही लेना चाहिए।
सेक्यूलर स्टेट की कल्पना का उदय पवित्र रोमन साम्राज्य 'होली रोमन एंपायर' के विरोध में हुआ।
फिर भी यदि हम यूरोप को देखते हैं तो पाएंगे कि जिन्होंने सेक्यूलर शब्द का सबसे ज्यादा प्रयोग किया वे ही राज्य, मत विशेष के पक्षपात की नीति से मुक्त नहीं हो पाएं है। 
इंग्लैंड का राजा अब भी defender of the faith (धर्म रक्षक) कहा जाता है तथा उसे church of England के नियमों को मानना होता है। अमेरिका में भी president (राष्ट्रपति) के लिए शपथ लेते समय विशिष्ट धार्मिक विधि को पूरा करना आवश्यक है।
   भारतवर्ष में तो वास्तविक रुप से राज्य की कल्पना के अंतर्गत लौकिक राज्य की ही कल्पना है। हमारे यहां धर्मगुरु को कभी राजा का स्थान नहीं मिला है। यहां तो राजा चाहे किसी भी मत को मानने वाला हो लेकिन वह सदैव सभी मतावलंबियों के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करता था।
   आज भारतवर्ष के नेतागण यद्यपि पश्चिमी आदर्शो को अपनाकर भावी भारत की कल्पना करना चाहते हैं। उनके अनुसार पश्चिम के अर्थ में सेक्यूलर स्टेट का अर्थ लौकिक राज्य ही लगाया जा सकता है।लेकिन भारतीय जनता धर्म-राज्य या राम-राज्य की भूखी है और वह केवल लौकिक उन्नति में ही संतोष नहीं कर सकती। 
   असाम्प्रदायिक शब्द के द्वारा हमारे नेताओं का अर्थ भी अधिक स्पष्ट होता है क्योंकि आज सेक्यूलर शब्द का प्रयोग केवल पाकिस्तान से,जिसने अपने आप को 'इस्लामी राज्य' घोषित किया है, भिन्नता दिखाना ही है। भारत इस्लामी राज्य के समान किसी एक संप्रदाय का राज्य नहीं है यही हमारे नेता प्रकट करना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने 'सेक्यूलर' शब्द चुना है। आज यद्यपि सांप्रदायिक और राष्ट्रीय शब्दों का ठीक-ठीक ज्ञान ना होने के कारण सेकुलर शब्द का नाम लेकर रेडियो से गीता और रामायण आदि का पाठ बंद करना आदि अनेक कार्य कर दिए जाते हैं। फिर भी भारतीय राज्य का आदर्श घोषित करते समय हमारे नेताओं के मस्तिष्क में जो प्रधान धारणा रही है वह "असाम्प्रदायिक" शब्द से ही अधिक व्यक्त होती है।
   भारतीयता की स्थापना भी केवल एकांगी उन्नति से नहीं हो सकती क्योंकि हमने लौकिक और पारलौकिक उन्नति को एक दूसरे का पूरक नहीं, तो एक दूसरे से अभिन्न माना है।किंतु पारलौकिक उन्नति के क्षेत्र में राज्य की ओर से किसी एक मत की कल्पना अनुचित होगी।अतः उसके द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न करना होगा जिसमें सभी मत बढ़ सके तथा *"एकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति"* के सिद्धांत का पालन कर सकें। 
   सेक्यूलरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) का मतलब भारतीय संस्कृति में प्रयुक्त *"धारणाद्धर्ममित्याहु: धर्मो धारयते प्रजा:"*  होनी चाहिए। ऐसे तो इस परिभाषा का भाव अंग्रेजी के रिलिजन शब्द से भिन्न तथा बहुत ही व्यापक है। परंतु भारत की संप्रभुता,एकता व अखंडता के लिए भारतीय संस्कारों से ओत-प्रोत विचारों को ही अपनाने की आवश्यकता है। आज संसार में शांति स्थापना हेतु सिर्फ भारत को ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व को इस पथ पर चलना होगा तभी संसार में विश्व बंधुत्व की भावना का विकास होगा तथा प्राणी मात्र का हित भी।

      ✍️ प्रकाश कुमार तिवारी
               शिक्षा शास्त्री
    केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (भोपाल)