कौन सा रंग लगाए इस तन पर ओ कान्हा,
तोहर बिना प्रेम के हर इक रंग अधूरे लगते हैं...!
अपनी धड़कनों की तान अब सुनाने आ भी जाओ कान्हा,वृन्दावन की हर कलीयों से हाल पूछ रही हैं राधा...!

तेरी प्रेम भरी बातें मुझे बहुत ही सताती हैं राधा,
तेरे बिन,तुझसे दूर ये श्याम आज भी है आधा...!
दूर हूँ तो क्या हुआ,एक हाथ में लेकर रंग गुलाब का,खुद के अरमानों को रंग दे, तुझसे कहता है तेरा कान्हा...!
आकर ब्रज में मुझे फिर से मीठी धुन सुना जा,हर गोपी तेरी राह तके बैठी है बरसों से इन कुंज की गलियन में...!
आ कर वृन्दावन की गलियों में फिर से प्रेम की रास रचा जा कान्हा,रंगों से भी परे रंग तेरा है सांवला,किस रंगों से खुद को रंगू मैं ओ मेरे कान्हा...!
रंगों से भी परे रंग है प्रेम का ओ राधा,प्रेम हर इक रंगों में आज भी मौजूद है तेरा ये तेरा सांवरा,उन रंगों के कण कण में आज भी बसी है तू मेरी राधा,
तन से दूर हैं पर अयम से एक हैं, कान्हा का ही दूसरा नाम है राधा...!
🌱मनु✍🏻

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