जीवन के समन्दर में बनके बनके मछुआरे भटक रहें हैं,
जो पास है उसे न भोग बेहतर की तलाश में खफ़ रहे हैं।
लालसा में डूबते ही जा रहे हैं सत्य से नयन मूँदते जा रहे हैं,,
बस अपने ही हितैषी बन स्वार्थ में भीगते ही जा रहे हैं,
सब कुछ सुलझाने के लिए हम सब कुछ तज रहें हैं।
जीवन को झंझावतों से संलिप्त कर रहें हैं,
अपनों से दूर खुदको रिक्त कर रहें हैं,
फिर हम तन्हां क्यों यह कहकर बिलख रहें हैं।
अभिमान और स्वाभिमान में है जरा सा फर्क,
बहुत सूक्ष्म से अंतर देता है दोनों का स्पर्श,
अफसोस पहचानकर भी हम उसे सहज रहें हैं।
एक पल का नही भरोसा, हर तरफ है धोखा,
तो खोल ज्ञान चक्षु, किसने है रोका,
कदमों को विराम दे जो लालसा की दलदल में धंस रहे हैं।
जीवन के समन्दर में पग पग मछुआरों का डेरा है,
अपने जीवनयापन का उनका तो यही जरिया है,
यह हमारी बुद्धि की हार है जो हम जाल में उलझ रहें हैं।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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