कितने ही बसन्त आए और गए
हर बसन्त के साथ इंतजार रहा मुझको
शायद कोई बहार छू जाए इस बार दामन मेरा
पर इंतजार इंतजार ही रहा
न ही कोई बहार छू पाई दामन मेरा
न ही कोई हँसी का झरना आया मेरे पास
और अब तो बहारों का मौसम ही खत्म होने वाला है
ठूंठ हो रही जिंदगी
शायद कोई सावन अब नही आने वाला है
इंतजार बसन्त का शायद रह जाये इंतजार ही
शायद कभी न खत्म होने वाला इंतजार बन जाने वाला है।
निमिषा वर्मा

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