पलटती आँखों ने देखी,ऐसी पलक थी
रौशनी की चमक जो,तारें जम़ी थी
चलने को बेताब हूँ,पर कुछ पल के लिए
नज़ारें हरी-भरी,वस्ती की जैसी
पलटती आँखों ने......

पुरातत्व जमाने की,पर खोज नयीं  थी
इंसानों के 'कंकाल',बिख़री पड़ी थी 
हक़ीकत वह था,जो देखीं नहीं थी
पलटती आँखों ने......


जमानें की 'पोथी' पर,मिट्टी चढ़ी थी
हजारों वर्षों की 'तस्वीरें' नयीं थी
आदतें उन्हीं से जो हमनें,तो सीखा
कहावत पुरानी भाषाऐं नयीं थी
पलटती आँखों ने......


अगर तुम कहो तो,जला दें हम चिता
मगर 'शरीर' को,जलातीं हैं 'चिंता'
यादें तो उनकीं,सताती है पल में
आँखों का क्या है,रुलातीं है ग़म में 
पलटती आँखों ने......


हिचकते-हिचकते ठहर जाती है यादें
हकीकत की साहस,न तोड़े हैं हम भी
खुशियों की जिंदगी को,आगे ले जाना है फिर भी
पलटती आँखों ने......




        लेखक:-विकास कुमार लाभ
                      मधुबनी(बिहार)