हाँ मैं नारी हूँ, छोटे से, 
शब्द में समाहित,
पूरी सृष्टि की उजियारी हूँ, 
प्रेम विरह को संग संग, 
जीने वाली हूँ, हाँ मैं नारी हूँ
हाँ मैं नारी हूँ!! 


मैं वो नारी नहीं, जिसे गौतम, 
ने ठुकराया था, मैं वो नारी , 
भी नहीं, जिसे राम ने ठोकर
से जगाया था! 
बिन मेरे अस्तित्व ना हो, 
मैं कलयुग की चिंगारी हूँ, 
हाँ मैं नारी हूँ, हाँ मैं नारी हूँ!! 


धरती से आसमान तक मैं, 
तो छाने वाली हूँ! जिस रूप, 
में देखना चाहे, वही रूप मैं, 
लेने वाली हूँ! माँ, प्रेयसी, सुता, 
भार्या, भगिनी, दुर्गा काली, 
लक्ष्मीबाई हूँ, हर क्षेत्र में आगे, 
बढ़कर दिखाने वाली हूँ, हाँ
मैं नारी हूँ, हाँ मैं नारी हूँ! 


मर्यादा में रहकर बढ़ती रहूँ, 
हमेशा आगे, 
मेरे हाथों में लगी हो मेहंदी, 
रहे तेरे हाथों में मेहंदी से भरे हाथ! 
यही कायदा भी और दस्तूर भी हो! 
दें,नारी को इज्जत और मोहब्बत, 
यही बताने आई हूँ, हाँ मैं नारी हूँ, 
हाँ मैं नारी हूँ! 

                    श्वेता कर्ण!