जाते हुए राह पर
नगर के चौराह पर
एक ओर नजर पड़ी 
किसी नर कंकाल पर
असह्य सा लगता था
उसके लिए 
श्वांस का आवागमन भी
हो चुका था 
अवरुद्ध 
द्वार 
जीवन का उसके
निकट जा 
देखा ज्यों ही
वह
ठिठका  सहमा  झिझका
और
असहाय दृष्टि डाल
मुझ पर
घबराने लगा 
तन था कम्पमान
घबराहट की पहचान 
मैं बोली
क्या है जनाब 
ये
अकुलाहट  घबराहट 
सच सच बोलो 
हे
महामानव 
था कौन मिला
तुमको दानव
है हाल किया
किसने ऐसा 
मंहगाई  बेकारी  भुखमरी  या  धनहानि ने
यह सुन
वह बोला 
कंपकंपाते हाथ हिला 
सुनिए मेहरबान 
विश्वास कीजिएगा 
पेश है माजरा
गौर फरमाइयेगा
गाँव है सरगमा
थाना सुहागनगरी का
जाति का हूँ
ब्राह्मण 
नाम
धनपतराम
गुजर गया वक्त 
धन्नासेठ कहलाता था 
कभी
छोटा परिवार  
एक बेटा
नाम  
राममोहन 
बेटी थी एक
रूप की अनौखी
कृति 
नाम था उसका 
प्रति
इतना कह वह रुका
कंठ हुआ था 
अवरुद्ध 
वाष्प से जिसका
नजर दौड़ा चहुँ ओर
वह बोला
मन का बुरा था न मैं
मैंने किया था विवाह 
बेटी का
उस करम की हेठी का
दिया था दाइज
बेसुमार
लेकिन 
वह भूखे थे 
बहुत भूखे
भूख
मिटने का नाम ही न लेती थी उनकी 
वे बेटी को करते थे
परेशान 
नगर में मेरी भी थी
शान
जा पहुँचा 
मैं 
दीनों के रक्षक थाने
वहाँ पेश की एक 
अर्जी
बेटी की दुख दर्दी
मुझको वहाँ
आश्वासन दिया 
इशारा दस हजार का किया
मैंने भी देने का
वायदा किया 
पर ये क्या
मेहरबान 
कुछ ही दिन बीते
जो अपने थे
पिरीते
वह हुए अब
कुरीते
माजरा यह था
मिल उन बेटे बालों ने
पेट के महाकालों ने
चाँदी के जूते 
देकर
उल्टा केस लगा
रक्षकों  को बना
भक्षक
भेजा मेरे घर
करने को
कुर्की 
यह सुन 
मेरी पड़ाइन लुढ़की
भागा मैं भी वहाँ से
प्राण बचा
बेटे का है नहीं पता
इसी कारण 
सहमा और
घबराया हूँ
मैं तो निज रक्षकों  के
हाथ ठग आया हूँ
किस पै करूँ 
भरोसा
मैं ना समझ पाया हूँ
 मैं ना समझ पाया हूँ ।

                     देवयानी भारद्वाज
                 उसायनी फीरोजाबाद