साधक अपने साधना में लिप्त
इंद्रियां अपने कर एकाग्रचित्त ।।

साधु-संत-महात्मा करें मंत्र जप-तप
अभीष्ट सिद्धि को जीवन में रच-बस ।।

मातृ-पितृ करे, अर्पित समग्र जीवन
मिल जाए बच्चों को,खुशहाल जीवन ।।

मातृ-पितृ की ,कठोर साधना
नन्हे मन को,परिपक्व बनाना ।।

माली, बगिया की सेवा करता
कलियां,फूलों में वेश बदलता ।।

भक्त भगवन की करे साधना
मोक्ष प्राप्ति की करे उपासना ।।

इंसा जीवन पथपर ,करे कठोर साधना
निरंतर संघर्षों से लड़,करे पूर्ण कामना ।।

अपने-अपने मन की अभिलाषा
भिन्न-भिन्न साधक की लालसा ।।

                  ✍️मनीषा भुआर्य ठाकुर
                           कर्नाटक