दिन पनघट की याद करूँ मैं, 
ओ मेरे घनश्याम! 
आजा आजा वापस वृंदावन, 
मैं रोऊ सुबह शाम!! 

कैसे बताऊ तेरे बिन क्या, 
गुजरी है मुझ पर! 
पनघट पर मैं बाट निहारू, 
लेकर तेरा नाम!! 

पनघट सुना, गैया रोये, रोये, 
बाल गोपाल! 
बाग बागीचे सब रोये, 
है कहाँ नंदलाल!! 

भोर भये जब आऊ पनघट, 
लेकर के एक आस, 
आ जाओ ऐ मोहन मेरे, 
अब ना करो निराश!! 

               श्वेता कर्ण!