क्या पढ़ पाई थी तुमने
मेरे नयनों की पाती
खुद मैं समेट पीड़ा को
ज्यों जली दीप संग बाती!!

देहरी पर दीपशिखा बनकर
नहलाती रही तिमिर को
फिर भी मैं रोक नहीं पाई
स्मृतियों के विचरण को!!

वो पुष्प नहीं मैं बन पाई
जो तपन देख मुरझाए
होंठों की मुस्कानों की तह में
अवसादों को कभी समझ पाए?

अपनी अलकों में बांध रखी
विरहा की अकथ कहानी
फिर भी आंखों से मेघ बरस
कर जाते हैं मनमानी!!!!

            रश्मि मिश्रा "रश्मि"
              भोपाल (म.प्र.)