एक मासूम कली पी के घर चली
लिए रूप की दौलत संस्कारों की गठरी
कंचन बदन मेघ सम कुंतल
रक्तिम अधर मदभरे नयन
फूल से कपोल कजरारी अखियां
खिला नवयौवन इतराती गज गामिनी
जैसे मेघो में चमके चंचल दामिनी
ओढ के लाज का घूंघट निकली
खिली है मन में अरमानों की कली
पिया से मिलन के सपने सजा के
कदम पी के घर में रखा उसने
न आरती करी ना बलैया ली
घबरा गई वह नन्ही कली
सासु लगी उसके दहेज को टटोलने
न टीवी ना ए सी न सोने के गहने
लगा क्रोध का दावानल आंखों से बहने
पति भी लगा क्रोध से से तमतमाने
स्कूटर के सपने लगे मुंह चिढ़ाने
सास ननंद की रोज प्रताड़ना सहने लगी
पति के लात घुसो की मार पड़ने लगी
वह बसंत की कली पतझड़ में बदल गई
जी तो रही थी मगर जिंदा लाश बन गई
इस पर भी ना रुका बेरहमो का जुलम
नित नए तरीकों से रोज होने लगे सितम
दहेज का दानव कतरे कतरे में खा रहा था
अब उसे पूरा ही निगलने जा रहा था
आखिर एक दिन अति की पराकाष्ठा ही हो गई
खुदकुशी के नाम पर वह फांसी पर झूला दी गई
एक और मासूम कली दहेज की बलि चढ़ गई
जाने कब खत्म होगा यह यह दहेज का दानव
हैवान से इंसान कब बनेगा मानव
उषा जैन
कोलकाता

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