आज देश जल रहा है
 क्रोध अग्नि में यह पल रहा है 
 जानता नहीं है मानव क्रोध में 
 खुद को भस्म कर रहा है
  आज देश जल रहा है
  
   लालच में यह पल रहा है 
   रिश्वत चाटुकारिता का हो रहा बोलबाला
    भाई भाई को यहां डस रहा है 
    आज देश जल रहा है 
    
    द्वेष इसमें पल रहा है 
     तूने कहा मैं क्यों सुनूं 
    बड़े -छोटे का भेद खत्म हो रहा है
     आज देश जल रहा है
     
    अंहकार इसमें आ गया 
      राजनीति इसको भा गया 
      जनता की परवाह कहां
      सियासत गर्मा रहे हैं 
      सब करते हैं जेब गर्म 
      शर्मो हया सब जा रहे हैं 
      आज देश जल रहा है 
      
     आज देश जल रहा है
       काम इसमें छा गया 
       कुत्सित वीभत्स सा हो गया 
       भेद रहा ना बहन बेटी का 
       जीना दुश्वार हो गया 
       आज देश जल रहा है 
       
       माया की आपाधापी में 
       मैं मेरा की सोच में 
       इससे आगे और क्या
        देश जल रहा है
    
       कहां गए?
       तुम्हारे गुण जो थे तुम में हैं भरे  ,
       प्रेम ,शांति ,दया ,परोपकार ,अहिंसा 
       वापस जगाओ उठो यहां
        करें नवयुग की स्थापना 
        आज देश जल रहा है।
                     दिल की कलम से


                     मधु अरोड़ा