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आया पतझड़ हो गई सूनी, टहनी की मुस्कान,

कुछ पत्तों के झड़ने से, क्या मिट जाती पहचान,

पतझड़ के बाद ही, आती है बसंत बहार,

बन जाता है बसंत, उपवन का श्रृंगार,

प्रकृति की महानता,स्नेह लुटाती है, 

पालन पोषण मानव का करती, मां बन जाती है,

प्रकृति की गोद में है बहुमूल्य उपहार,

प्रकृति से धनी है यह सारा संसार,

आया पतझड़ हो गई सूनी, टहनी की मुस्कान,

कुछ पत्तों के झड़ने से,क्या मिट जाती पहचान,

संगीता वर्मा✍✍