एक स्त्री और पुरूष की दोस्ती की
जब मिसाल जब दी जाती है
तब द्रौपदी और कृष्ण की
दोस्ती याद आती है
न था कोई भाव पुरुष होने का
न स्त्री भावना ही नजर आती थी
ये मित्रता भी कई मायने में गजब ढाती थी
जब भी होती थी जरूरत ,
एक दूसरे का साथ निभाते थे
एक के पुकारने पर, दूजे दौड़े चले आते थे
हाथ कटा कान्हा का , दौपदी चीर फाड़ी थी
इस चीर से ही उंगली के, बहते रूधिर की बांधी थी
इस चीर का मोल भी ,बड़ा अजब चुकाया था
जब कृष्ण ने अपनी कृष्ना को
चीर हरण से बचाया था,
दिया था वचन अनमोल ,जब भी मुझे बुलाओगी
मुसीबत में सदा मुझे, अपने आस पास पाओगी
गलत होने पर रास्ता सही दिखाऊंगा
पड़ोगी जो कभी अकेली
तो मदद को दौड़ा आऊंगा
चावल के एक अन्न का भी
मोल कुछ इस तरह चुका दिया ,
दुर्वासा ऋषि के शाप से
अपनी सखी को बचा लिया
अपनी सखी का कभी अपमान न होने दिया
राह सही दिखा सखा होने धर्म निभा दिया।.।।
आशा झा सखी

2 टिप्पणियाँ