हवाओं से पूछे हो उसके ठिकाने, कैसे नादान हो।
समंदर की मौजों को चले नहलाने, कैसे नादान हो।
एक इन्सां को तो समझा न सके तुम इस जहाँ में।
खुदा को भी तुम तो चले समझाने, कैसे नादान हो।
वादे झुठे, वफ़ा झूठी सिर्फ थूक उड़ाना जाने सब।
लो अब चले हो अच्छे दिनों को पाने, कैसे नादान हो।
हर पल रोते रोते जिये है बारिशों की तरहा अकेले।
बादलों को जाओगे अब तुम रुलाने, कैसे नादान हो।
खुद गम से दूर हो, या गम कभी है देखा जिंदगीमें?
तुम तो जा रहे गम दूसरों का खाने, कैसे नादान हो।
ज़लज़लों से नावाफ़ीफ़ हो अभी तुम भी यार मेरे।
तुम जा रहे हो ज़मीनों को हिलाने, कैसे नादान हो।
फिरोज दहिवाला

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