जंगल में मस्ती छाई थी
सावन से हरियाली आई थी
हर तरफ नई पौध उगी थी
जो अब तक मिट्टी में दुबकी हुई थी
सूखे नदी - नालों में जान आई थी
जानवरों ने प्यास बुझाई थी
पत्ता - पत्ता चहक रहा था
डाली - डाली फूल महक रहा था
पेड़ों ने ली अंगड़ाई थी
बेलें भी शरमा कर अलसाई थी
जंगल में मंगल ऐसा हुआ
मोर नाचा शोर हुआ
जोड़ियां सबकी बनने लगी
जंगल में प्रीत बढ़ने लगी
झमाझम बारिश हो रही थी
मेंढक - मेंढकी की लॉटरी लग रही थी
देख कर जंगल की सुंदरता
आसमान भी झुक गया
मुख धरती का चूम लिया
धरती भी इठलाई थी
सावन से मदहोशी छाई थी ।
यह गीत सुना कर बरगद दादा अतीत से वर्तमान में आए ।
वे बहुत उदास और गमगीन थे । अपने चारों ओर पेड़ों और पौधों से बरगद दादा उदासी भरे स्वर में बोले, "जाने क्या हुआ है ? वायु में अब वह बात नहीं रही । ऐसा लगता है कि शरीर में कुछ कमी आ गई है ।"
नीम वृक्ष बोला, "अरे नहीं बरगद दादा, आप तो अभी भी जवान हो । शरीर में कुछ कमी नहीं आई । इस हवा में ही कुछ गड़बड़ है । जाने कहां से चली आ रही है ? मुझे भी अजीब सा महसूस हो रहा है ।"
पलाश का पेड़ बोला, "ऐ हवा, तू ही बता यह क्या चक्कर है ? आजकल तेरे में वह बात नहीं रही जो पहले थी । हम सभी को कुछ ठीक नहीं लग रहा ।"
हवा मस्ती से झूमती हुई बोली, "मेरा कोई कसूर नहीं है ।तुम्हें तो दुनिया की कुछ खबर ही नहीं । एक ही जगह पड़े रहते हो । तुमने तो मनुष्य नामक जानवर का नाम भी नहीं सुना । यह सब उसी का किया धरा है ।"
लहराती हुई लता पेड़ से लिपटते हुए बोली, "मनुष्य ? यह कौन सा जानवर है ? हमें भी बताओ उसके बारे में ।"
हवा हंसते हुए बोली, "मनुष्य बहुत ही विचित्र जानवर है । वह पक्षी की तरह उड़ सकता है । मछली की तरह तैर सकता है । जमीन पर तो उसने पूरा अधिकार जमा रखा
है । यह जो तुम्हें चांद - सूरज नजर आते हैं ना, इसमें भी अपना दखल रखता है । उसकी भूख कभी शांत नहीं
होती । पेट भर जाता है तब भी वह अच्छे और बुरे तरीके से जमाखोरी करता है । जिस हवा में सांस लेता है, खुद ही उसे दूषित करता है । जो पानी उसका जीवन है उसी पानी को गंदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ता । धरती का तो बुरा हाल कर रखा है । जहां - तहां गंदगी के ढेर मचा रखे हैं ।"
शहतूत का पेड़ चिंतित होते हुए बोला, "क्या वे इंसान यहां भी पहुंच सकते हैं ?"
हवा बोली, "हां शहतूत भाई, इन मनुष्य की नजर अब जंगलों पर ही है । खुद इन्होंने अपनी आबादी बहुत ज्यादा बड़ा ली है । अब सबके खाने और रहने के लिए यह जंगलों को धीरे-धीरे खत्म कर रहे हैं ।"
नन्हा सा जंगली फूल रूंआसा होते हुए बोला, "लेकिन हमने उनका क्या बिगाड़ा है ? हमने तो कभी उनसे कुछ नहीं कहा, कुछ नहीं मांगा ।"
हवा लहराते हुए बोली, "तुम लोग समझते क्यों नहीं मनुष्य अपने आप को सर्वश्रेष्ठ और ज्यादा समझदार समझता है ।
लेकिन मनुष्य से ज्यादा मूर्ख और कोई नहीं है । वह पानी को जल कहकर देवताओं को चढ़ाता है और खुद ही पानी में केमिकल और गंदगी डालकर पानी को जहरीला भी बना रहा है ।"
हवा गुस्से से बोली, "वह मूर्ख जानता है कि पेड़, हवा, पानी के बिना वह खुद भी जी नहीं पाएगा, फिर भी इन का विनाश करने पर तुला है ।"
हवा की बातें सुनकर बरगद दादा चिंतित स्वर में बोले, "ऐसा करके तो वह अपने भी अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है ।
ऐसा ही रहा तो जंगल तो इतिहास की बातें हो जाएंगे ।"
सभी ने एक साथ चिंतित मुद्रा में सहमति से सिर हिलाया ।
धनु दयाल

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