बहुत प्राचीन समय की बात है एक राजा विक्रम सिंह था जो बहुत ही न्याय प्रिय राजा था।
बहुत बार भेष बदल कर प्रजा में घूमा करता था, आस-पास के राज्य में भी जाया करता था ताकि वह स्वयं प्रजा की समस्याएं देख और सुन सके।
उसकी वीरता, न्याय और दान शीलता के चर्चे दूर-दूर तक के।
ऐसे ही एक बार वह अपने राज्य में भेष बदलकर घूम रहा था। उसने सोचा के पास के राज्य में जा कर देखता हूंँ। गहरा जंगल बीच में था वह रात को निकल रहा था,
वहां एक संन्यासी की कुटिया दिखाई दि, राजा ने दंडवत प्रणाम कर उस संन्यासी से प्रार्थना कि क्या वह रात को यहां रुक सकता है।
सन्यासी ने मुस्कुराते हुए राजा को यह आज्ञा दे दी और राजा ने संन्यासी के लिए भोजन पकाया, सन्यासी की रात को पैर दबाए और तरह-तरह के धर्म, अधर्म विषयों पर चर्चा की।
उसने न्याय करने के अलग अलग तरीके पूछे।
सुबह सवेरे राजा विक्रम सन्यासी से भी पहले उठे, पास की नदी में स्नान किया, जल भरकरलाए, कुटिया की सफाई की तथा भोजन बनाकर तैयार कर दिया।
संन्यासी जब तक नहा कर, अपनी योग साधना करके वापस आए तो राजा ने उनके सामने भोजन परोसा।
संन्यासी ने कहा राजा विक्रम मैं आपकी सेवा भाव से बहुत प्रसन्न हूं।
संन्यासी से राजाने पूछाः महाराज आप तो अंतर्यामी हैं, आपने मुझे इस भेष में भी पहचान लिया।
संन्यासी ने कहा राजन हमने तो आपको कल ही पहचान लिया था और सच मानिए हम आपका इंतजार कर रहे थे कि कब आप हमसे मिले कुछ अमूल्य उपहार आपको देने के लिए।
फिर सन्यासी ने एक माला और एक छड़ी राजा को भेट स्वरूप दी।
सन्यासी ने बताया राजन यह माला पहनकर आप अंतर्ध्यान हो जाओगे, किसी को दिखाई नहीं देंगे इसलिए आप अपना न्याय करने के लिए इसका उपयोग करना ताकि कोई आपको ना देख सके आप उनको देखकर सही न्याय कर सके।
और यह छडी हर रोज रात को सोने से पहले आपको मांगने पर एक आभूषण भेंट करेगी।
अब राजा विक्रम को जब यह दोनों अद्भुत चीजें मिली उन्हें बहुत ही प्रसन्नता हुई और संन्यासी का धन्यवाद देकर उस जंगल से अपने महल की तरह लौट आए।
परिश्रम से कोई कार्य किया जाएगा तो भाग्य अवश्य
साथ देगा
वंदना शर्मा

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