आज मैं एक पुराने अखबार में एक लेख पढ़ी, उसे पढ़कर मेरे दिल में उस माँ के प्रति सम्मान भर आया और मैं अपनी डायरी को बताये बिना ना रह सकी! ये जो डायरी है ना, हमारी ओपन डायरी है और, इसे हर कोई पढ़ सकता है।
और प्रेरणा देने वाली लेख है यह तो!
झारखंड में रामगढ़ के रजरप्पा टाउनशिप में पिछले तीस साल से झाडू लगाने वाली सुमित्रा देवी का आज आखिरी दिन था! विदाई समारोह के दौरान अचानक एक नीली बत्ती लगी कार और उसके पीछे दो अन्य बड़ी कारें समारोह स्थल के पास पहुँची! नीली बत्ती वाली लगी कार से सिवान ( बिहार) के डीएम, पीछे की दोनों कारों से रेलवे के चीफ इंजीनियर एवम् चिकित्सक उतरे और हॉल में पहुँचे। मैं उन लोगों का नाम नहीं लिख रही।
तीनों बेटों को एक साथ देख कर माँ सुमित्रा देवी की आँखों से खुशी के आँशु बह निकले। बेटों को अपने आला अधिकारी से मिलवाते हुए वह बोली- साहब, मैं तो पूरी जिन्दगी झाडू लगाती रही, मगर मैंने अपने तीनों बेटों को साहब बना दिया!
जब सुमित्रा ने बारी बारी से बेटों का परिचय कराया तो उनके अफसर सहित समारोह में मौजूद लोग दंग रह गए!
एक सफाई कर्मी महिला के तीन अफसर बेटे। डीएम डॉक्टर और इंजीनियर! सहकर्मी को सुमित्रा देवी पर गर्व महसूस हो रहा था कि वे एक ऐसी महिला के साथ काम कर रहे हैं, जिसके बेटे इतने ऊँचे पदों पर हैं।
बेटों ने माँ के संघर्ष की कहानी से सबको अवगत कराया! उन्होंने कहा कि उन्हें बहुत खुशी है कि जिस नौकरी के दम पर उनकी माँ ने उन्हें पढाया लिखाया, आज उससे विदाई समारोह में वे उनके पास हैं!
सुमित्रा देवी तीन दशक की अपनी सेवा याद भावुक हो उठीं! उन्होंने कहा कि यह नौकरी इसलिए नहीं छोड़ी कि इसी की कमाई से उनके बेटे पढ़ लिख कर आगे बढ़ सके और आज उन्हें गर्व का एहसास करा रहे हैं!
धन्य हैं वो माँ, जो खुद संघर्ष करके अपने बेटों को अफसर बना ली! प्रणाम है उन्हें!
ऐसी माओं से प्रेरणा लेकर मैं भी अच्छी माँ बन सकूँ यही कोशिश है मेरी!
श्वेता कर्ण!

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