हर तरफ धूम धड़ाका था लाइटों का रंग बिखरा था,
बहुत मस्त खुशियों में डूबा हर तरफ नजारा था।
क्या शोख था मौसम मस्ती ही मस्ती थी,बहुत सही कहा दी भीड़ से कभी कभी वो एहसास नही मिलता,
जो एक तुम्हारे होने से मिल जाता है।
तभी तो भर आती हैं आँखे तेरी गैर मौजूदगी में,
तभी तो यह रिश्ता सबसे खास कहलाता है।
शामिल वहाँ बड़ी बड़ी हस्ती थीं।
कहकहे जवान थे तालियों का शोर बरपा था।
इन सब मे रह रहकर कोई याद आ रहा था,
बिना उसके दिल को कुछ नही भा रहा था,
क्यों शामिल नही हो जाते तुम भी कहकर कोई और मुस्कुरा रहा था।
दिसम्बर की सर्दी वो रात,याद आ रही थी उससे वो मुलाकात,
वो घबराए शरमाए से जज्बात,मिलने आयी कितनी मिन्नतों के बाद
झुकी झुकी सी पलकें शर्म से गुलाबी चेहरा और भी सुर्ख हो रहा था।
यह सारे संगीत उसकी खनकती आवाज के आगे बेकार थे,
सारी चकाचौंध उसकी मोहब्बत भरी आँखों से शर्मसार थे।
वो नूर मलिका थी ,मैं खुद ही किसी शहंशाह सा हुआ जा रहा था ।
जब से वो बिछड़ा है बहारों का भी मौसम लगता उजड़ा है,
हर तरफ दिल तलाशता उसी का दिलकश चेहरा है,
सब थे मस्त मस्तियों में और मैं उसकी यादों से दिल बहला रहा था।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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