जीवन की दरिया में डगमगाती,
बल खाती इतराती एक कश्ती
हौले हौले चल रही समंदर के लहरों संग
माझी खेवनहार जिसे थमा कर पतवार
उतारा गया था जीवन दरिया में।
चलती है अनवरत कभी टकराती है तूफ़ानों से।
हवा का रुख़ देख अपनी चाल बदल लेती।
कभी पतवार को थामे हिलती डुलती बलखाती
हिचकोले खाती चलती है
तो कभी गहरे पानी में डगमगाने लगती।
खेवनहार जिसके हाथ में पतवार होता।
कभी छेड़ देता ख़ुशी का राग।
तो कभी ताकता आसमान की ओर
आशा भरी निगाहों से।
देख कर तेज हवाओं का रुख
दहल जाता कलेजा
ख़ुद ब ख़ुद हाथ उठ जाते आसमान की ओर
प्रभु रक्षा करना मेरी कश्ती की
बीच भंवर में हूं।
पार लगाना, हर बुरी नज़र से बचाना।
कमज़ोर कश्ती है खेवनहार को शक्ति देना।
ताकि सामना कर सके राश में आने वाली बाधाओं का।
आंधी और तूफ़ान से।
धडम ढल रही अंधेरा भी घना हो रहा।
दूर बहुत दूर दिखता कहां किनारा।
संभालना प्रभु
मेरी जीवन की कश्ती तुम्हारे हाथ पतवार।
पार लगा देना।
किनारे पहुंचा देना।
मणि बेन द्विवेदी
वाराणसी उत्तर प्रदेश

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