एक बार एक गली  के एक कुत्ते को।
अचानक मिल गया उसे,एक साहब का पालतू कुत्ता।
पूछने लगे दोनो एक दूसरे का हालचाल।
पहले पालतू ने बताया अपना पूरा हाल।
किस तरह मालिक करता था उसकी देखभाल।
आज भी लाया था अपने साथ उसे टहलाने।
मौका पाकर लगा मैं तुमसे बतियाने।
हाल सुन पालतू के ऐशो आराम का।
वो बेचारा रह गया चुप,हो गया गुमसुम।
दूसरे के बहुत पूछने पर लगा बताने अपना हाल।
सुनकर उसके दुःख दर्द को वह भी थोड़ा हुआ उदास।
फिर कहा उस कुत्ते ने आज तुम किसी,
मानव से पूछना! कुछ ये  प्रश्न विनम्र.......

गली के कुत्ते का एक मानव से प्रश्र----

क्यों हो दुत्कारते हो मुझे !
क्योंकि मैं हूं एक गली का कुत्ता।
क्यों करते हो मुझे तंग ।
देखकर मेरा ये खराब ये रुप रंग।
कोई मुझे छेड़े न तो मैं काटता भी नहीं उसे।
यदि उनकी कोई हरकत, लग जाती बुरी मुझे।
दे देते हो एक रोटी तो मैं सामने तुम्हारे,
अपनी कुछ देर दुम  हिलाता रहता हूं ।
महीनों बाद भी गर देखूं तुम्हे ।
तुम्हारे तलवे चाटने लगता हूं ।
चलता तुम्हारे पीछे -पीछे तुम।
मिल  जाते हो,कभी सड़क पर।
दुत्कार अगर देते हो तुम,
चला जाता वापस मुड़कर।
आज के इस युग में अपने ही अपनों को,
लूटते , ठगते और दे  देेते हैं धोखा।
मानव जैसा रंग बदलते ,मैंने किसी को नहीं देखा।
मैंने यदि खा लिया कभी नमक तुम्हारे घर का।
तब देखना रंग,इस कुत्ते की नमक हलाली का।

स्नेहलता पाण्डेय
नई दिल्ली