भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो बाबा साहब भीमराव अंबेडकर संभवत पहले अध्येता हैं जिन्होंने जातीय संरचना में महिलाओं की स्थिति को जेंडर की दृष्टि से समझने की कोशिश की ।

हकीकत में भारत में स्त्रियों के सशक्तिकरण के असल नायक बाबा साहब भीमराव अंबेडकर हैं ।

बाबा साहब के शब्दों में, "मैं किसी समुदाय की प्रगति को इस पैमाने पर देखता हूं कि उसकी महिलाओं ने कितनी प्रगति की है । सबसे बड़ी बात, विवाह करने वाली प्रत्येक लड़की अपने पति के सामने खड़ी हो, अपने पति की मित्र और बराबरी की साथी होने का दावा करें और उसकी दासी बनने से इंकार करें ।"

मुंबई की महिला सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, "नारी राष्ट्र की निर्मात्री है । हर नागरिक उसकी गोद में पलकर बढ़ता है । नारी को जागृत किए बिना राष्ट्र का विकास संभव नहीं है ।"

महिला सशक्तिकरण की दिशा में उनके ऐतिहासिक कदम से आज शायद बहुत कम महिलाएं परिचित होंगी ।

5 फरवरी 1951 को बाबासाहेब ने संसद में हिंदू कोड बिल पेश किया । इसका मकसद हिंदू महिलाओं को सामाजिक शोषण से आजाद कराना और पुरुषों के बराबर अधिकार दिलाना था । इसी बिल में महिला सशक्तिकरण की असली व्याख्या है । संसद में हिंदू कोड बिल मसौदे को रोके जाने के बाद बाबासाहेब ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया । इस मसौदे में उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की बात कही गई थी ।

ज्यादातर सवर्ण महिलाएं इस बात से अनजान है कि जब उनकी जाति के पुरुष उनके अधिकारों के बीच धर्म का विशाल पहाड़ खड़ा कर रहे थे तब बाबा साहब, दशरथ मांझी बनकर अकेले उस पहाड़ को तोड़ रहे थे ।

बाद में यह बिल 4 हिस्सों में विभाजित होने के बाद संसद से पास हुआ ।

बाबासाहेब के संविधान की ही देन है - गर्भवती महिलाओं को प्रेगनेंसी लीव और महिलाओं को सक्षम बनाने के लिए महिलाओं को आरक्षण ।

बाबा साहेब का चिंतन का केंद्र महिलाएं थी । 
पुरुष वर्चस्व की निरंतरता को कायम रखने के लिए महिलाओं का धार्मिक और सांस्कृतिक आडंबरों के आधार पर शोषण किया जा रहा था । 
धार्मिक मान्यताओं में महिलाओं को लेकर राय थी की पत्थर की मूर्तियां धन, विद्या और शक्ति की देवी हैं इनकी पूजा तो की जा सकती है लेकिन जीती - जागती स्त्री को अधिकार नहीं दे सकती । जीती - जागती स्त्री तो घर से बाहर भी नहीं निकल सकती, शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकती, धन कमाना और किसी भी रूप में शक्तिशाली होना तो बहुत दूर की बात है स्त्री को दोयम दर्जे का प्राणी समझा जाता था । 
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार रात और दिन कभी भी स्त्री को स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिए । उन्हें लैंगिंक संबंधों के द्वारा अपने वश में रखना चाहिए । बालपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र उसकी रक्षा करें । स्त्री स्वतंत्र होने के लायक नहीं ।

स्त्रियों को समानता, शिक्षा का अधिकार सिर्फ संविधान के द्वारा प्राप्त हुआ है । शिक्षा प्राप्त कर हर स्त्री, पुरुष के समान हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा सकती है । संविधान स्त्री को पूजता नहीं बल्कि अधिकार देता है कि वह आर्थिक, शैक्षिक, मानसिक, शारीरिक रूप से स्वतंत्र है और अपना विकास कर सकती है ।

                       जय भीम जय संविधान


                        धनु दयाल