प्रीत लगी श्याम सुंदर से
आया बसंत फूल सब फूले
खेतों में सरसों है फूली
पीली भई पिया विरह से में
अटके प्राण अधर में
क्या कहूं मैं मुरलीधर से
प्रीत लगी मेरी श्याम सुंदर से
इतनी अरज श्याम सुंदर से कहियो
विरह अग्नि में जिया जरत है
जब से गए श्यामा तुम यहां से
दर्शन को अखियां तरस रही
फागुन में होली सब खैलत है
पिया संग बरजोरी सब करत है
पिया बिरहा में जोगन है निकली
घूमे वृंदावन की गली-गली में
श्यामसुंदर मेरी इतनी अरज है
कृपासिंधु गिरधारी से
भटक रही हूं भवसागर मे
पार लगा दो नैया मेरी
बनकर तुम ही खिवैया।।
दिल की कलम से
मधु अरोड़ा

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