अपने को तो मैंने बांट दिया
अब खुद को कहां तलाश करूं ।
मेरा, सब में थोड़ा-थोड़ा हिस्सा है
सभी से मैं प्यार करूं ।
जब खुद को वे चोट देते हैं
चित्कार मैं बारंबार करूं ।
उम्मीद, हसरतों से देखती हूं
जब उनका श्रंगार करूं ।
खिल जाती हूं, संवर जाती हूं
जब उनका दीदार करूं ।
मैं ही तो हूं उनमें
उनसे नहीं, खुद से मैं प्यार करूं ।

                       

                    धनु दयाल