ज़िन्दगी की शून्यता भरने को
न जाने कितने
शून्य जोड़े
परन्तु
परिणाम क्या हुआ
शून्य ही न
उद्विग्न मन की वेदना
आंखों में चुभते
टूटकर बिखरे स्वप्न श्रृंखलाओं की पूर्णता हेतु
हिरनी सी दौड़
तितली सी उड़ान
उस दिशाहीन
टिटहरी प्रयास का परिणाम
जलती तपती दिशाएं
कंटकाकीर्ण राहें
सूर्य रश्मियों के मध्य
छतिग्रस्त बदरंग पंख तितली
क्षुभित विगलित हृदय
अपने ही कृत्य पर
क्यों जीवन चुना था मैंने
किसी कड़वे नीम का
जलते तपते सूर्य का
किसी टिमटिमाते दीप का
एक ओस की बूंद का
यह भूल थी मेरी
या नियति।।
देवयानी भारद्वाज
उसायनी फीरोजाबाद

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