रात के साये में टिमटिमाता दीपक
वो निर्धन वो भूख की प्यास
ज्वर है मेरे लाल को एक मात्र अंधकार में आ जा निंदिया आसपास
ज्वार मिटा दे साथ-साथ
सुन जिंदगी तुझे सुनाऊं
ह्रदय की धक-धक वो भूख की प्यास
करुणा के स्वर हैं मेरे
चारों आंधीया मेरे लाल को घेरे
लड़ रही इनसे मां की ममता वह होकर हताश
रात के साये में टिंमटिमाता दीपक
वह निर्धन वो भूख की प्यास
धीरे-धीरे ज्वर है बढ़ता मां का दिल मोम सा पिघलता
बुझने ना दूंगी यह दीपक
जब तक हृदय में आस
रात के साए में टिंमटिमाता दीपक
वो नहीं आय़े अब तक
जो गये थे वेध को लाने
सुबह से हो गई आधी रात
ना कुछ खाया ना कुछ पिया
निर्धनता का कैसा अभिशाप
रोते-रोते चुप सा हो गया
मेरे लाल को एक क्या हो गया
आई औषधि आधी रात
बाटी औषधि मिलकर साथ
रात के साए में टिमटिमाता दीपक
वो निर्धन वो भूख की प्यास
भोर हुए तो देखा दीपक
जलता रहा सुबह तक साथ
लाल की किलकारी मां की आस
सब खिल उठी पहले जैसे आज
रात के साए में टिमटिमाता दीपक
वो निर्धन भूख की प्यास की प्यास
✍लक्ष्मीनारायण

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