शहर, देश या दुनिया, हर जगह खेले शतरंज।
दिमाग वालों के बीच ही देखने  मिले शतरंज।

कदम भरना फूंक फूंक के, खेल बड़ा ही चतुर।
चाल एक जाये भूल, खिलाडी मात खाये शतरंज।

खेल रहे दो ही खिलाडी, और देखते उन्हें हज़ारों।
ढेरों इंतज़ार के बाद एक चाल आगे जाये शतरंज।

अपनी अपनी पसन्द है, कोई चाहे कोई धुत्कारे।
कहीं बर्बाद ए वक़्त लगे, किसी को भाये शतरंज।

चल रही है दुनियां आज, शतरंज के इशारों पर।
चले सियासत हर तरफ, जम कर  खेले शतरंज।

आँख मिचौली जैसे खेले, एक दूजे को फंसाना।
मिल के फिर सबका मुसकाना, जैसे जीते शतरंज।

सियासतों  में येही खेल होता , घूमना और घुमाना।
गुमराह करने को विपक्षों को , चाल चलते शतरंज।


         फिरोज दहिवाला