हांँ मैं हूंँ नारी, बेचारी दुनिया से हारी,
 मेरी चुप्पी को समझते हैं कमजोरी,
 त्याग ममता करुणा क्षमा की मूरत बनाकर बिठा दिया मुझे,
 कर्तव्य की बेडी में बांँध पत्थर की मूरत समझा मुझे,
 पुरुष प्रधान समाज में अपनी पहचान ढूंँढती हूंँ,
 मायके और ससुराल में अपना मकान ढूंँढती हूंँ,
 जब किया मैंने भरोसा तब मुझे धोखा मिला,
 इस तरह लूटा सभी ने जब जिसे मौका मिला,
 प्राण लेने को मेरे कुछ वार अपनों ने किए,
 शत्रुओं का सा अजब व्यवहार सपनों ने किए,
मिली राहतों् की न मंजिल अभी तक,
संस्कारों की तो कभी मर्यादा की बेडो में जकड़ी हूंँ अभी तक,
हे ऊपर वाले  मुझे नारी बना कर भेजना था,
 तो क्यों ना दिल मेरा पत्थर का बना दिया होता,
ना दर्द होता ना चोट लगती,
 पत्थर दिल जहांँ में,
 पत्थर बनकर मैं भी रहती।


                  रमा बहेड 
           हैदराबाद तेलंगाना