मन की बातों को
कौन रख सका मन में
विचारों का प्रवाह
कब उमड़ जाये
रख रूप नयननीर का

प्रवाह नयननीर का
रोक लिया तो क्या
मन का प्रवाह
उमड़ पड़ा
धर रूप काव्य का

दुख न होता 
कविता भी न होती 
आंसूओं के खारे जल से सिंचित 
दुखों की खाद से पौषित 
यह काव्य का पौधा

दिवा शंकर सारस्वत। " प्रशांत"