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खुली आंखों से जैसे कोई सपना देखा।
जब इस तस्वीर पर माला चढ़ते देखा।
इक पल में ये हक़ीक़त का साथ
महज़ तस्वीरों तक सिमटते देखा।
मज़बूत लोहे को भी पिघलता पाया
जब बूढ़ी आंखों में अश्कों का समंदर देखा।
एक इंसान .....किस्सा बन गया पाया
जब एक बड़ा साया सिर से उठ गया देखा। 
क्या होली क्या दीवाली खोखला पाया
वो वक्त जब दिन भी रात सा काला देखा।
जिंदगी को उड़ती धूल सा सस्ता पाया
जब पहली बार कोई अपना खो गया देखा।

5 मार्च ,2020 वो दिनांक जब मैंने इक "अनमोल साया" मेरे "बाबा" को ......... हमेशा के लिए खो दिया, 😭 

कुछ तारीखें एहसासों से  ऐसे जुड़ी होती हैं
जिंदगी कितनी भी आगे बढ़ जाए 
पर वो वहीं की वहीं ठहरी रहती हैं।😞😞😓

.......✍️🌅🙏 ऋतु बाजपेई