शादी में राधा के पिताजी मुझे भी निमंत्रण दिया था आने के लिए और रमा भी मुझसे शादी में चलने के लिए जिद कर रही थी। अतः मुझे जाना पड़ा।
बरात नाचते गाते दरवाजे तक पहुंची । द्वार पूजा के समय मैंने दूल्हे को देखा, दूल्हा बहुत गोरा और बहुत सुंदर था । मेरे मन को थोड़ी तसल्ली हुई कि भाई साहब ने दूल्हा सुंदर खोजा है लेकिन दूसरे ही पल यह सोच कर थोड़ी शंकित हो गई कि हमारी राधा का रंग सावला है और लड़का इतना गोरा चिट्टा है ।इसने राधा को पहले से देखा भी नहीं है अगर उसका सांवला रंग इसे पसंद नहीं आया तो …….लेकिन मन ने इस विचार को झटक दिया और मैं शादी की रस्मों में व्यस्त हो गई। दूसरे दिन सुबह राधा गीली आंखों से ससुराल के लिए विदा हुई। लड़की की विदाई के समय का दृश्य बहुत ह्रदय विदारक होता है इस बात से सभी लोग भलीभांति परिचित होंगे।
पहली बार राधा अपने दूल्हे के साथ अपनी चाची के घर आई थी। में भी वहीं पर थी। पूरे घर में खुशी का माहौल था। अकेले में मैंने उसे पूछा राधा तू खुश है ना अपने ससुराल में ।इस पर राधा का उत्तर था -"हां चाची ससुराल में में बहुत खुश हूं सब बहुत ध्यान रखते हैं । लेकिन पढ़ाई न कर पाने की टीस मेरे मन में रह रह कर उठती है और तब मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता।"
मैंने अपने मन की शंका को दूर करने के लिए उससे पूछा-- "" दामाद जी तो सुंदर है कभी वह तुझे तेरे साँवले पन को लेकर कुछ कहते तो नहीं है इस प्रश्न को सुनकर राधा चुप हो गई फिर उसने कहा -"नहीं चाची ठीक है ...मैं तो उनके सामने कुछ भी नहीं हूं ।
लेकिन मुझे पता है चला था कि वह तुमसे कम पढ़े लिखे हैं ।
फिर वह कहने लगी ""यहां जैसा माहौल भी नहीं है वहां पर । गांव में औरतें घर के बाहर भी नहीं निकलती है घर के अंदर ही रहना पड़ता है।
इस तरह कुछ साल और बीत गए । बड़े भाई राहुल की शादी में आई हुई थी। चाची ने सारी जिम्मेदारी उसी के ऊपर छोड़ दिया था। राधा ने अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। लेकिन उसकी आंखों में मैंने कहीं ना कहीं सूनापन देखा।
मैंने गौर किया कि दामाद जी चुप चुप रहते थे तो मैंने राधा से पूछा जी" दामाद जी हमेशा ऐसे चुप चुप रहते हैं ।"
इस पर उसने कहा -" हां सचिन की यही आदत है यह घर में भी किसी से ज्यादा नहीं बात करते हैं केवल काम से काम रखते हैं।"
रमा ने भी दामाद जी को नेग में सोने की अंगूठी और चेन दिया ।
आज बहू के मुंह दिखाई की रस्म थी । राधा ने दुल्हन को एक सोने का चेन दिया। उस चेन को देखकर रमा के मन में कुछ खटक गया कि यह तो वहीं चेन है जो उसने राधा को उसकी शादी में दिया था। ये लड़की अपनी चेन क्यों दे रही है ससुराल वालों ने लड़की को मुंह दिखाई के लिए कुछ दिया क्यों नहीं जबकि उसके ससुराल वाले बहुत संपन्न है।
शादी के नौ साल हो चुके थे लेकिन उसकी गोद अभी तक सूनी थी। यह सूनापन अब उसकी आंखों में भी छलक ने लगा था। बातों बातों में पता चला कि उसकी हड्डियों में अब दर्द रहने लगा है और बहुत इलाज कराने के बाद भी ठीक नहीं हो रहा है। जैसा कि गांव में लोग नीम हकीम और सोखा ,ओझा पर विश्वास करते हैं ।
उसके ससुराल वाले भी उसे इन्हीं सब कुचक्रों में फंसाते गए । कोख हरी करने के चक्कर में उससे यह गठिया की बीमारी उपहार में मिल गई थी ।
वो इन झाड़-फूंक और तंत्र मंत्र से परेशान हो चुकी थी और आयुर्वेदिक दवाइयां खा खा कर उसके शरीर में बहुत गर्मी भी फैल चुकी थी। लेकिन उसने कभी भी अपनी ससुराल वालों की की शिकायत नहीं की हमेशा उसके चेहरे पर मुस्कुराहट ही रहती थी लेकिन आंखों में सूनापन झलकता था।
मैने रमा से भी कहा "राधा के ससुराल में ठीक है ना! इस पर राधा रमण ने भी मुझे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया मेरे मन की उलझन और बढ़ गई।
उसकी मां और चाची ने भी कई तीर्थों पर राधा के लिए मन्नतें भी मांग रखी थी।
सीमा भी अब नौकरी कर रही थी उसने अपने साथ के एक सहकर्मी को पसंद किया था और दोनों परिवार वाले भी राजी थे। दोनों का विवाह बहुत धूमधाम से संपन्न हुआ। राधा अपनी बहन के भाई के विवाह की तरह बहन के विवाह की भी सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लिया ।ननद भाभी ने मिलकर शादी की सारी तैयारियां की।
सीमा को गिफ्ट देने के लिए राधा एक पैकेट बनाकर ले आई थी ।उस पैकेट को गिफ्ट पेपर से पैक कर किया हुआ था और साथ में सोने की एक अंगूठी अपनी बहन को देने लगी। लेकिन उसकी चाची ने मना कर रही थी। इसी राधा ने कहा चाची मैं अपनी बहन को से रही हूं आप बीच में मत बोलिए। इस बात पर चाची चुप हो गई।
सीमा ने कहा वाह दीदी कितनी सुंदर अंगूठी है।
जीजू ने खरीदा है क्या? राधा चुप थी।
रमा ने अंगूठी पहचान ली। ये अंगूठी भी उसने ही दिया था राधा को।
चाची राधा से कहने लगीं -" बेटा तू ससुराल में खुश है कि नहीं, तेरे ससुराल वाले हम लोगों से खुश नहीं हैं क्या?"
बात दिन लेने की नहीं है।
"हमें उनका कुछ भी नहीं चाहिए लेकिन अपने पास से क्यों देती है ।"
"हम तेरे अपने हैं कोई गैर नहीं जो तू अगर कुछ नहीं देगी तो हम तुझे सुनाएंगे या किसी से कहने जाएंगे ।"चाची की बातों को सुनकर उसकी आंखों में आंसू आ गए और वह उनसे लिपट गई बोली-" नहीं चाची ऐसी बात नहीं है और मम्मी जी तो दे रही थी लेकिन मैंने ही कहा कि मेरे पास तो इतनी अंगूठियां पड़ी हुई है इसी में से एक दे देती हूं।
सीमा की विदाई हो गई कुछ दिन रुक कर राधा अपने ससुराल चली गई।
स्नेहलता पाण्डेय
नई दिल्ली

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