पात्र परिचय
राम : अयोध्या के राजा
सीता : अयोध्या की रानी और राम की पत्नी
भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न : राम के भाई
मांडवी : भरत की पत्नी व सीता की छोटी बहन
उर्मिला : लक्ष्मण की पत्नी व सीता की छोटी बहन
श्रुतिकीर्ति : शत्रुघ्न की पत्नी व सीता की छोटी बहन
कौशल्या, कैकेई और सुमित्रा : श्री राम की माताएं
सुमंत्र : अयोध्या के मंत्री
रमा : सीता की विश्वस्त दासी
नागरिक
नट
नटी
प्रथम अंक
(पर्दे के पीछे से नट बाहर आता है।)
नट : सभी महानुभावों को मेरा प्रणाम। अरे नटी। देखो तो। कितने लोग नाटक देखने आये हैं। सारी तैयारी कर ली या नहीं। इन सभी महानुभावों को एक बार प्रणाम तो करने आओ। इन्हें बताओ तो कि आज रंगमंच पर कौन सा अभिनय होगा।
(नटी पर्दे से बाहर आती है।)
नटी : प्रणाम महानुभावों। हाथ जोड़कर क्षमा मांगती हूं। आज यहाँ कोई भी मंचन नहीं होगा।
नट : अरे भाग्यवान। आज किस बात पर रूठ रही हो। देखो, इतने महान लोग रंगमंच देखने आये हैं। वैसे अब चलचित्र के जमाने में भी ये रंगमंच के दीवाने यहाँ तक आये हैं, यही बड़ी बात है। फिर जब ये बिना नाटक देख चले जायेंगें तो इन्हें कितना बुरा लगेगा।
नटी : आप सब पुरुष एक जैसे हों। केवल दिखाने के लिये स्त्री को मान देते हों। पर स्त्री से कोई भी स्नेह नहीं करता है। खुद के मान अपमान के लिये यदि स्त्री का परित्याग भी करना हो तो वह भी तुरंत कर दोंगें। बिना विचारे कि इस स्त्री ने पुरुष के लिये कितने त्याग किये हैं।
नट : तुम स्त्रियों के मन में न जाने कब क्या बैठ जाये। अरे मैं तो नाटक का मंचन भी तुमसे पूछकर करता हूं।
नटी : अरे वाह रे पुरुष। पुरुष केवल दिखावा कर सकता है। तुम्हारी तो बात ही क्या है। स्वयं श्री राम अपनी धर्म पत्नी से पूछकर राज्य करते थे। राजदरबार में भी रानी सीता उनके बराबर बैठ कर रानी का कर्तव्य पूर्ण करती थीं। पर अपने अपमान की बात आते ही उन्होंने देवी सीता का परित्याग कर दिया।
नट : अब समझा। आज सीता परित्याग नाटक का मंचन करना है।
नटी : महान लोगों। आप हमारी रंगशाला में आये हैं। आपका बहुत बहुत आभार। आज आपके समक्ष ऐसे नाटक का मंचन करूंगी जिसमें प्रेम भी है, त्याग भी है, कर्तव्य भी है। एक स्त्री के अबला से सबला बनने की वह कहानी है जिसे अक्सर स्त्री पर पुरुष के अन्याय की कहानी भूलवश समझा जाता है। आज नाटक में माता सीता के परित्याग की लीला का मंचन किया जायेगा। महान लोगों के इस विवादित चरित्र के पीछे की बातों को सामने लाने का प्रयास किया है। बस थोड़ी देर और संयम रखें। नाटक का अभिनय प्रारंभ होने बाला है।
(नट और नटी दर्शकों को प्रणाम कर पर्दे के पीछे चले जाते हैं।)
(पर्दा उठता है। दो पुरुष दिखाई देते हैं। दोनों ने साधारण लोगों जैसे वस्त्र पहने हैं।एक युवा और दूसरा वृद्ध है )
सुमंत्र : पुत्र राम.... (हकलाकर) महाराज।
राम : चाचाजी। आपको पिता जी छोटा भाई ही समझते थे। बचपन से ही आपके मुख से खुद के लिये जो पुत्र संबोधन सुनता आया हूं, उसके समक्ष महाराज संबोधन बहुत फीका लगता है।
सुमंत्र : आपकी बात ठीक है महाराज। पर राजा बनना कोई आसान काम नहीं है। राजा केवल राजा होता है। अपने सभी व्यक्तिगत संबंधों को जो बेधकर राजा का कर्तव्य निभा सके, उसी को राजा कहलाने का अधिकार है। इसीलिये राजा को पृथ्वी पर ईश्वर का दूसरा रूप कहा जाता है।
राम : सचमुच। राजा कभी भी फूलों की शैय्या पर नहीं सोता है। राजा बनने का अर्थ कांटों के बिछोने पर सोना है। वह तो सीता खुद इतना काम देखती है। जब से सीता अयोध्या की रानी बनी है, उस समय से हर रोज राजदरबार की कार्यवाही संचालित करती है। गर्भावस्था में आराम करने के लिये मेने ही उसे ज्यादा जोर दिया। पर अभी भी राजमहल में मेरा स्वागत सीता के प्रश्नों से ही होता है। महल में रहकर भी प्रजा के कार्यों का पूरा विवरण लेती है।
सुमंत्र : महाराज। सीता जैसी स्त्रियां अनेकों युगों में कोई पैदा होती है। मुझे याद है कि महारानी सीता स्वर्गवासी महाराज दशरथ के राज कार्य में भी बराबर मदद करती थीं। महाराज दशरथ भी महारानी सीता की बुद्धि की प्रशंसा करते थे। एक दिन महारानी सीता ने महाराज दशरथ को बोला था कि पिता जी, आपके राज्य में स्त्रियों को वह सम्मान नहीं है जो उन्हें मिलना चाहिये। अभी भी आपके राज्य में स्त्रियां राजकार्य संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाती हैं।
राम : मुझे भी याद है। पिता जी ने उस दिन मुझे आदेश दिया था कि अवध देश में आगामी शासक केवल राजा नहीं होगा। पुत्री सीता हर बात में तुम्हारी तरह दक्ष है। तुम्हारे साथ तुम्हारे सिंहासन पर बैठकर रानी का कर्तव्य निभायेगी।
सुमंत्र : महाराज। पर आज भी लोगों के मन में स्त्रियों के लिये उतना सम्मान नहीं है जो होना चाहिये। रामराज्य का गुणगान सभी करते हैं। पर अवध में रामराज्य है कहाॅ। अवध का शासन तो महारानी सीता और महाराज राम मिलकर कर रहे हैं। फिर अवध की खुशहाली का आधार सीताराम राज्य है।
राम : आप सत्य कह रहे हैं। जल्द ही सीता अवध की नारियों में चेतनता का वह पाठ पढा देंगी कि कोई भी स्त्री को पुरुष से कमतर नहीं मानेगा। चाचाजी। वह क्या बात हो सकती है कि गुप्तचर उसे बता नहीं पाया।
सुमंत्र : महाराज। प्रजा की उसी समस्या को जानने के लिये हम वेष बदलकर घूम रहे हैं। जो भी बात होगी, हमें जरूर पता चल जायेगी।
राम : प्रजा की हर समस्या को जानना राजा का अधिकार है तथा उसे दूर करना उसका कर्तव्य। वैसे सीता भी हमारे साथ आने को बोल रही थीं। बहुत समझाने पर मान गयी हैं। पर प्रजा की हर बात जानना वह एक रानी का अधिकार कहती हैं। फिर बिना उस बात को जाने मेरा राजमहल पहुंचना संभव नहीं है। चाचा जी। लगता है कि कोई आ रहा है।
(दो लोग पर्दे के पीछे से बाहर आते हैं।)
पहला : ईश्वर का लाख लाख धन्यवाद है कि हम अवध देश में पैदा हुए हैं। वैसे तो हर सूर्यवंशी राजा प्रजा को संतान के समान मानता रहा है। प्रजा के लिये खुद भी कष्ट सहन करता रहा है। पर महाराज राम तो उनमें भी सर्वश्रेष्ठ हैं। चारों तरफ सुख और शांति है। प्रजा में कोई भी दुखी नहीं है। ब्राह्मण केवल यजमान को सम्मान देने के लिये भिक्षा ग्रहण करते हैं। बच्चों की शिक्षा की राज्य की तरफ से पूर्ण व्यवस्था है। पथिकों के लिये सराय बनायी गयी हैं। राजा प्रजा से न्यूनतम कर लेकर उसे पूरा का पूरा प्रजा के लिये खर्च कर देते हैं। महाराज और महारानी राजकोष से एक निश्चित वेतन लेते हैं। तथा उसी से अपना व परिवार का भरण पोषण करते हैं।
दूसरा : पर भाई। राज्य की इस उन्नति में हमारी महारानी का भी बड़ा योगदान है। किसी भी पुरुष की सफलता उसकी स्त्री के त्याग पर निर्भर करती है। यह तो महारानी सीता का बड़प्पन हैं कि उन्होंने सारे भोग त्याग कर अपने पति के साथ निश्चित वेतन में ही गुजर बसर करने का निश्चय किया है। अभी तक महारानी का अर्थ राजा की पत्नी से ऊपर उठकर आज महारानी सीता पहली बार वास्तव में अवध की रानी बनी हैं। अभी तक बेटियां कभी भी गुरुकुल में पढने नहीं जाती थीं। राजवंश की बेटियां महल में रहकर शिक्षा प्राप्त कर लेती थीं। आज महारानी सीता ने राज्य में अनेकों कन्या गुरुकुल खोल दिये हैं। आज बेटियां भी बेटों की भांति शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। खुद महारानी सीता व उनकी तीनों बहनों ने घर घर जाकर कन्या शिक्षा के प्रति जागरुकता लायी है। भला इतना कौन कर सकता है।
पहला :भाई। आप सही कह रहे हैं। शिक्षित नारियां ही देश का भविष्य होती हैं। खुद महारानी और उनकी बहनें शिक्षित हैं। तभी तो वे कन्या शिक्षा पर इतना ध्यान दे रही हैं।
दूसरा : मेने तो यह भी सुना है कि महारानी की योजना राज्य के प्रमुख कार्यों में भी महिलाओं को महत्वपूर्ण पद देने की है।
पहला : हाँ भाई। जब शिक्षित होने के कारण महारानी राज्य की व्यवस्था सम्हाल रही हैं तो महिलाओं के पूर्ण शिक्षित हो जाने पर महिलाएं राज्य में मुख्य भूमिका निभा सकेंगीं। इस बात में कोई संदेह नहीं है।
सुमंत्र : प्रणाम भाइयों। हम दूसरे राज्य से आये हैं। आपने अपने मुख से महाराज और महारानी की जो तारीफ की है, उसे सुनकर मेरा मन प्रफुल्लित हो गया है। ऐसे प्रजा वत्सल राजा और रानी के राज्य में वास करना सबसे ज्यादा हितकर है। (श्री राम की तरफ देखकर) भतीजे। समझे। इस राज्य में प्रजा को कोई शिकायत नहीं है। सब सुखी हैं।
राम : समझ गया चाचाजी। अवध की प्रजा हर तरह से खुश है और अपने राजा और रानी से पूर्ण संतुष्ट है।
पहला नागरिक : रुको भाई। इतनी जल्द किसी निष्कर्ष पर मत पहुंचो। राज्य में हर जगह सफाई हो रही है। इसलिये सूअर बहुत दुखी हैं। जन्म से ही विष्ठा भोजी पशु अपना आहार त्यागने को तैयार नहीं हैं। हमेशा पुरुष को ही श्रेष्ठ समझते आये पुरुषत्व के अहंकारी लोग एक स्त्री को अपनी रानी ही नहीं समझ पाये हैं। महारानी की स्त्री चेतना के प्रयासों का गुपचुप विरोध करने बाले भी कम नहीं हैं।
राम : पर महारानी तो प्रजा हित के लिये लगातार तत्पर हैं। फिर उनका विरोध क्यों?
दूसरा नागरिक : भाई। आप दूषित लोगों की मनोवृत्ति नहीं समझ सकते हैं। शायद आप विश्वास भी न करें कि लोगों की भावनाएं किस तरह दूषित हो सकती हैं। अपने पति के साथ वन वन घूमने बाली परम सती स्त्री के चरित्र को भी लोग दोष देते हैं। खुद राजा होकर प्रजा के धन को पूरी तरह प्रजा के लिये खर्च करने बाले व अति साधारण वेतन लेकर अपना जीवन चलाने बाले महाराज राम को भी कुछ लोग स्त्री लोलुप कहते हैं। आखिर उन्होंने दूसरे पुरुष के साथ रहने बाली स्त्री को अपनाया है तथा अपने साथ सिंहासन पर रानी के रूप में भी बिठाया है। राज्य का हर निर्णय अपनी स्त्री से पूछकर करते हैं।
राम (विह्वल होकर) : नहीं। यह नहीं हो सकता। यह तो किसी के जीवन की व्यक्तिगत बात है। यदि किसी को अपनी स्त्री के चरित्र पर विश्वास है तो अन्य किसी को उनके संबंधों में कहने का क्या अधिकार।
पहला नागरिक : भाई। आप बड़ी तरह से सोचते हैं। पर दुष्ट लोगों के कुतर्क ऐसे ही प्रसिद्ध नहीं हैं। देखिये। ऐसे ही एक महान व्यक्ति आ रहे हैं। आप खुद इनके तर्क सुन लें।
(पर्दे के पीछे से तीसरा आदमी बाहर आता है।)
तीसरा नागरिक : नमस्कार भाइयो। कैसे हाल हैं।
दूसरा नागरिक : नमस्ते बंधु। हमें तो सब ठीक लग रहा है। हमारी बेटी पाठशाला से पढकर आती है। सचमुच वह पढाई में बहुत होशियार है। भविष्य में वह हमारा नाम करेगी।
तीसरा नागरिक : अरे मूर्खों। ये पाठशालाएं और कुछ नहीं, अपितु नारियों को स्वच्छंद बनाने का षडयंत्र है। स्वच्छंद स्त्रियां हमेशा समाज और देश का पतन करती हैं। स्त्री को तो हमेशा पुरुष का अनुकरण करना चाहिये। उनमें इतनी सामर्थ्य ही नहीं है कि वे नैत्रत्व कर सकें। ईश्वर प्रदत्त विशेषता को भला कौन त्याग सकता है। स्त्री का काम तो बस संतान को जन्म देना और घर चलाना होता है।
राम : अरे भाई। स्त्री के विषय में इतनी छोटी सोच। माता दुर्गा भी तो स्त्री थीं। जब कोई भी देवता जो वास्तव में पुरुष रूप ही थे, महिषासुर का सामना न कर पाया तो माता दुर्गा ने ही उसका अंत किया था।
तीसरा नागरिक : अब भाई हम तो आम मनुष्य हैं। हम देवी और देवों की तुलना क्या करें। हम तो राजपरिवार की भी बराबरी नहीं कर सकते। राजा की कथनी और करनी में भी अंतर है। फिर भी कोई कुछ नहीं कहता।
सुमंत्र : भद्र पुरुष। आपका राजा तो दिन और रात प्रजा के लिये लगा रहता है। ऐसा दूर राज्यों तक प्रसिद्ध है।
तीसरा नागरिक : भाई। दीपक के नीचे जो अंधेरा होता है, उसे नजदीक बाले ही जानते हैं। राजा राम वैसे बहुत प्रजापालक हैं। पर वास्तव में स्त्री लोलुप भी हैं। जो स्त्री अनेकों महीने दूसरे पुरुष के साथ रही, उसे उन्होंने अपनाया है और राज्य की रानी भी बनाया है। वैसे भाई सबकी अपनी अपनी बात है। बड़े लोग कुछ भी करें, कौन टोकता है। पर प्रजा की इच्छा का सम्मान करने का झूठा आडंबर करना तो ठीक नहीं है। एक तरफ तो राजा राम प्रजा के लिये अपने परिवार को भी पीछे रखने का दावा करते हैं। दूसरी तरफ कोई भी बताये कि महाराज राम ने अपनी स्त्री को रानी बनाने से पूर्व किसी से पूछा था। यह तो वही बात हो गयी कि हम करेंगे अपने मन की और बोलेंगे प्रजा का शासन।
पहला नागरिक : भाई। राजा भी तो एक मनुष्य है। उसका अपना भी व्यक्तिगत जीवन है। यदि किसी को अपनी पत्नी के चरित्र पर विश्वास है तो दूसरों का इससे क्या प्रयोजन। फिर महारानी सीता ने लंका में अपनी पवित्रता अग्नि परीक्षा देकर सिद्ध भी की है।
तीसरा नागरिक : सही बात है भाई। चाटुकार शव्द का जन्म ऐसे ही नहीं हुआ है। बड़े लोगों की तो गलत बातें भी सही कही जाती हैं। यदि कोई आंख बाला भी अपनी आंखें बंद कर ले तो उसे कैसे समझा सकते हैं। सीता ने अग्निपरीक्षा किसके सामने ली थी। फिर राजा का कौन सा व्यक्तिगत होता है। दुख की बात यह है कि हमारा राजा ऐसा स्त्री लोलुप है कि उसने अपनी स्त्री की बढाई में अनेकों झूठी बातें प्रचारित कर रखी हैं। कुछ लोभ देकर वानर और भालू जैसी जंगली जातियों को अपनी तरफ मिला रखा है। अग्नि परीक्षा का कोई भी प्रमाण नहीं है।
दूसरा नागरिक : जैसे सूर्य को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है। महान लोगों का तेज ही उनके कर्मों का प्रमाण बनता है। एक न एक दिन सभी के मन भी महारानी सीता की महानता की ज्योति से जगमगायेगा। (राम और सुमंत्र की तरफ देखकर) अच्छा भाइयों। हमें वार्तालाप करते हुए काफी समय हो गया। अब हम चलते हैं। प्रणाम।
(तीनों नागरिक चले जाते हैं।)
राम : चाचाजी। यह मेने क्या सुन लिया। इतना सुनकर भी मेरे प्राण पखेरु नहीं उड़े। तो फिर यह सत्य ही है कि पुरुष का प्रेम केवल दिखावा होता है। वास्तविक प्रेम तो बस स्त्रियां ही कर सकती हैं। जो पुरुष पर अपना तन , मन और प्राण भी त्याग देती हैं। अरे दुख का विषय है कि स्त्री लोलुप कहकर पुकारा जाता यह राम वास्तव में प्रेम के मार्ग का भी अनुसरण नहीं कर पाया। खुद के प्रेम के विषय में अनुचित संवादों को अपने कानों से सुनकर भी जीवित खड़ा है।
सुमंत्र : महाराज। अनेकों बार जीवन में ऐसी स्थिति आती है। बड़े लोगों का बड़प्पन साधारण लोग समझ नहीं सकते। फिर समय ही वह ओषधि है जो सभी घावों को भर देती है।
राम : चाचाजी। अब आप मुझे महाराज न कहें। राजधर्म और प्रेम मार्ग में मैं दोनों का अनुसरण नहीं कर सकता। हाॅ मैं स्त्री लोलुप हूं। वैसे भी मैं केवल प्रजा के लिये ही राज्य सम्हाल रहा था। राज्य का भार भरत को सोंपकर सीता सहित मुनियों के आश्रमों में रहकर जीवन व्यतीत कर दूंगा। स्त्री लोलुपता कहो या स्त्री से प्रेम, पर इस मार्ग पर चलकर दिखा दूंगा।
(राम भूमि पर गिर जाते हैं। पर्दा गिरता है। पर्दे के पीछे से नट और नटी बाहर आते हैं।)
नट : प्रेम में केवल स्त्रियां ही त्याग नहीं करतीं। पुरुषों ने भी प्रेम में बहुत खोया है। एक राजा के पुत्र व अवध के राजा राम अपनी पत्नी के प्रेम में राज्य त्यागने को तैयार हैं।
नटी :पर प्रेम के विषय में हमेशा जीत स्त्रियों की होती है। स्त्रियाँ वहाँ से सोचना शुरू करती हैं जहाँ पुरुषों की सोच समाप्त हो जाती है। आगे का मंचन कल होगा। निश्चित ही इस कथा में प्रेम, त्याग और कर्तव्य उससे भी विशाल रूप में है जितना कोई सोच सकता है।
(नट और नटी दर्शकों को अभिवादन कर चले जाते हैं।)
प्रथम अंक समाप्त...
क्रमशः...
नाटक : सीता परित्याग : अंक २
(पर्दे के पीछे से निकलकर नट बाहर आता है।)
नट : सभी आगंतुकों को प्रणाम। स्त्रियाँ पुरुषों से कितनी भी बराबरी करनी चाहें पर तैयार होने में हमेशा पुरुषों से पीछे ही रहती हैं। पुरुष कभी भी तैयार होने में ज्यादा समय नहीं लगाते हैं। पर स्त्रियों को श्रंगार का ऐसा नशा होता है कि एक बार शुरू किया श्रंगार पूरा ही नहीं होता। (नटी को आवाज लगाते हुए) अरे भाग्यवान। तैयार होने में कितना समय लोंगीं। दर्शक आज के नाटक की प्रतीक्षा कर रहे हैं। और आप हों कि तैयार ही नहीं हो पा रही हो।
( पर्दे के पीछे से नटी का आगमन। आज नटी विशेष रूप से तैयार हो कर आयी है। सुंदर वनारसी साड़ी पहने, बालों को जूड़े के रूप में बांधे, आंखों में काजल लगाये, बहुत सुंदर लग रही है।)
नटी : हाॅ स्वामी। आखिर तैयार होने में समय तो लगता ही है।
नट : पर भाग्यवान। आप तो ऐसे तैयार होकर आयी हो, कि आज रंगमंच पर मुख्य अभिनय आपका ही हो।
नटी : (दर्शकों की तरफ देखते हुए) महानुभावों। माफी चाहती हूं। पुरुष स्त्री से कितना भी बढकर खुद को दिखाये पर ऐन मौके पर सब भूल जाता है। यदि स्त्री न हो तो समय पर अपना सम्मान भी न बचा पाये।
(नट की तरफ)
स्वामी। आज अभिनय में न केवल मुझे भाग लेना है अपितु आपको भी भाग लेना है। आपको श्री राम के छोटे भाई शत्रुघ्न का अभिनय करना है और मुझे श्रुतिकीर्ति का।
नट : (सर पर हाथ रखते हुए) अरे भाग्यवान। यह तो मुझे याद ही नहीं रहा। मैं तैयार होने जा रहा हूं। आगे बात सम्हाल लेना।
नटी : ऐसे नहीं। सभी आगंतुकों के समक्ष बोल कर जाइये कि यदि स्त्रियां ही न रहें तो पुरुषों को गलती सुधारने का मौका भी न मिले।
नट : हाॅ हाॅ। आगंतुक महानुभावों। स्त्रियाँ ही पुरुषों की गलती सही कराती हैं।
( नट भागकर पर्दे के पीछे चला जाता है।)
नटी : आगंतुक महानुभावों। आपको जो असुविधा हुई है, उसके लिये क्षमा चाहती हूं। वैसे यह सत्य ही है कि पुरुष तैयार होने में अधिक समय नहीं लेते। पर श्रंगार पर तो स्त्रियों का विशेषाधिकार है ही। इसलिये निश्चय पूर्वक कह सकती हूं कि आपको अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी होगी।
(नटी दर्शकों को अभिवादन कर पर्दे के पीछे चली जाती है। थोङी देर बाद पर्दा उठता है। नटी श्रुतिकीर्ति के वेष में उपस्थित है।)
श्रुतिकीर्ति : जब तूफान गुजर चुका है फिर भी न जाने क्यों आजकल मेरा मन विकल होता है। लगता है कि यह शांति किसी विशाल तूफान का आरंभ है।
(शत्रुघ्न के वेष में नट प्रवेश करता है।)
शत्रुघ्न : किस चिंता में खोयी रहती हो श्रुति। अवध वासियों के इतिहास में जो कठिन समय था, वह गुजर गया। अवध की शासन व्यवस्था की चहुंओर तारीफ हो रही है। महारानी के साथ साथ आपने भी कन्याओं को शिक्षित बनाने का जो बीड़ा उठाया है, वह निश्चित ही पूर्ण होगा। पर सत्य बात तो यह है कि मुझे भी आपके इतना सुशिक्षित होने का पता नहीं था।
श्रुतिकीर्ति : प्रणाम आर्य पुत्र। आप कब आ गये।
शत्रुघ्न : अभी अभी आया हूं। आज भैय्या और मंत्री सुमंत्र वेष बदलकर प्रजा के मध्य गये हैं। दरबार की आवश्यक कार्यवाही भरत भैय्या ने सम्हाली थी। वैसे जब से महारानी दरबार में नहीं आ रही हैं, दरवार थोङा सूना सूना सा लगता है। बड़ी भाभी के पास हर समस्या का समाधान तुरंत तैयार रहता है।
श्रुतिकीर्ति : जी आर्य पुत्र। बड़ी दीदी तो वैसे भी सबसे ज्यादा ज्ञानी थीं। तभी तो गुरुमाताओं का उनपर विशेष प्रेम था।
शत्रुघ्न : श्रुति। ये किन गुरु माताओं की बात कर रही हों। आपको शिक्षा तो आपके कुलगुरु शतानंद जी ने दी होगी।
श्रुतिकीर्ति : स्वामी। आपसे कुछ भी छिपाना शायद ठीक नहीं होगा। कुलगुरु शतानंद जी हमें शिक्षा देने आये थे। पर दीदी के कुछ प्रश्नों पर विचलित हो गये। एक स्त्री चाहे उसने कितना भी बड़ा अपराध किया हो, फिर भी अपने पुत्र के लिये पूज्य ही होती है। भले ही महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या की कुछ भूल रही हो पर उनके पुत्र शतानंद द्वारा लोकभय से अपनी माता का त्याग करना ठीक तो नहीं। आखिर एक माता का स्थान खुद ईश्वर से बढकर है।
शत्रुघ्न : आपका कथन सत्य है देवी। बड़े भैय्या और भाभी के वनवास का कारण माता कैकेई को मानकर जब भैय्या भरत उनकी उपेक्षा कर रहे थे तो भैय्या राम ने उन्हें भी माता कैकेई का सम्मान करने का आदेश दिया था।
श्रुतिकीर्ति : फिर चार दिव्य देवियों ने हम चारों बहनों को शिक्षित किया था। महर्षि वशिष्ठ की पत्नी माता अरुंधती को भी उन्हीं ने शिक्षित किया था। ऐसा गुरु शतानंद ने हमें बताया था।
शत्रुघ्न : राजकुमारी। आप धन्य हैं। आपको जिन्होंने शिक्षित किया, वे तो खुद देवों की शक्तियां थीं। पर आज कल आप उदास दिखाई देती हो। इस उदासी का कारण।
श्रुतिकीर्ति : स्वामी। बहुत समय से चित्र नहीं बनाया था। दीदी को उपहार में देने के लिये एक चित्र बनाने बैठी। पर चित्र पूर्ण ही नहीं हो पा रहा है।
शत्रुघ्न : अरे। इतनी सी बात के लिये चिंता। मांडवी भाभी और उर्मिला भाभी भी तो निपुण चित्रकार हैं। उनसे मदद ले लो।
श्रुतिकीर्ति : दोनों दीदियां भी प्रयास करते करते हार गयीं। कोशिश करने पर भी शुरुआत नहीं हो पा रही।
शत्रुघ्न : ऐसा क्या चित्र है। मुझे भी तो दिखाओ।
श्रुतिकीर्ति : बुरे दिनों का दर्शन करना हितकर तो नहीं स्वामी।
शत्रुघ्न : भला एक चित्र से कैसे दुर्दिनों की कल्पना की जा सकती है।
श्रुतिकीर्ति : स्वामी। यदि कोई भविष्य को पहले से जानता हो तो हर इशारे को समझ सकता है। फिर भी आपको वह चित्र दिखाती हूं। आपसे अनुरोध है कि चित्र किस तरह अपूर्ण है, इस विषय में कोई प्रश्न न करें।
शत्रुघ्न : ठीक है श्रुति।
(श्रुतिकीर्ति एक चित्र शत्रुघ्न को देती है। शत्रुघ्न चित्र की सुंदरता में खो जाते हैं।)
शत्रुघ्न : वाह। इतना सुंदर चित्र। माता सीता के साथ दो शिशु कितने मनोहारी लग रहे हैं। उनपर से नजर ही नहीं हटती। मुझे तो यह चित्र कहीं से अपूर्ण नहीं लगता। पर आपको अपूर्ण लग रहा है तो शायद ऐसा ही हो।
( दरबान का प्रवेश।)
दरबान : शत्रुघ्न कुमार की जय हो। महाराज ने आपको व अन्य भाइयों को इसी समय गुप्त मंत्रणा के लिये बुलाया है।
(दरबान चला जाता है।)
शत्रुघ्न : भैय्या ने बुलाया है। मुझे जाना होगा।
(शत्रुघ्न भी चले जाते हैं।)
श्रुतिकीर्ति : मेरा मन डूबा जा रहा है। पहले तो दीदी के साथ उनके पुत्रों का चित्र बनाने पर कोशिश करने पर भी महाराज का चित्र नहीं बन पा रहा। ऊपर से महाराज ने गुप्त मंत्रणा बुलायी है। आखिर क्या बात है। मांडवी और उर्मिला दीदी के पास चलती हूं। अरे दोनों दीदी तो यहीं आ रही हैं।
(मांडवी और उर्मिला का प्रवेश)
मांडवी : श्रुति। ये हवाओं के संकेत तो ठीक नहीं हैं। वैसे भी ईश्वर की वाणी असत्य हो जाये पर एक सती की वाणी कभी गलत नहीं होती।
श्रुतिकीर्ति : हाॅ दीदी। मैं भी यही सोच रही थी। हम सभी ने कोशिश कर ली पर चित्र में सीता दीदी के पुत्रों के साथ महाराज राम का चित्र नहीं बना पाये। जब भी कोशिश करती हूं, तूलिका टूट कर गिर जाती है। आप दोनों ने भी प्रयास किया। हर बार यही हुआ। जैसे चित्र कुछ कह रहा है।
उर्मिला : हाॅ श्रुतिकीर्ति ।अब तो सचमुच रोने का मन कर रहा है। सती तोती का दीदी को दिया श्राप पूरा होने का समय आ गया है। दीदी को महाराज से फिर से वियोग मिलने बाला है।
(तीनों बहनें गले लगकर फूट फूट कर रोने लगती हैं।)
मांडवी : वो बचपन के दिन भी क्या दिन थे। हम चारों बहनें हॅसती गाती वाटिका में बिचरा करते थे। तभी एक दिन वाटिका में दिव्य तोतों का जोड़ा आया। उनसे अवध कुमारों की कथा सुनकर हम चारों बहनों को उनसे प्रेम हो गया था।
उर्मिला :मुझे याद है। एक बार जब तोता और तोती जाना चाह रहे थे, तब सीता दीदी ने तोती को जाने नहीं दिया। मेने और मांडवी दीदी ने भी सीता दीदी का समर्थन किया था। पर श्रुतिकीर्ति तोती को तोते के साथ जाने की कहती रही। वह तोती पक्षी योनि में परम सती थीं। उन्होंने अपने पति के विरह में अपने प्राण त्याग दिये।
श्रुतिकीर्ति : हाॅ दीदी। उसी सती तोती ने आप तीनों बहनों को एक बार अपने पति से विरह का श्राप दिया था। पर सीता दीदी को सबसे बड़ी होने के कारण दो बार पति वियोग का श्राप दिया।
मांडवी : श्रुतिकीर्ति। हमने एक बार पति वियोग सहन कर लिया। पर सारे लक्षण सीता दीदी के उनके पति महाराज राम से पुनः वियोग का संकेत कर रहे हैं। ऐसे में सती तोती के एक ही शव्द याद आ रहे हैं कि वह वियोग का काल साधना का काल होगा। युगों तक कीर्ति अमर रहेगी। मानवता को राह दिखाती रहोंगीं। पर हाय दैव। विधि का विधान भले ही मिट जाये पर एक सती का श्राप... ।
(तीनों बहनें उच्च स्वर में रोने लगती हैं। पर्दा गिर जाता है। पर्दे के पीछे से नट निकलकर बाहर आता है।)
नट : महानुभावों। ईश्वर का विधान भले ही मिट जाये पर एक सती की बात कभी नहीं मिट सकती। खुद माता सीता सती के वचन को मिटा नहीं सकीं। वास्तव में वियोग तो माता सीता की उस साधना का काल बना जिसके कारण वह आज भी याद रखी जाती हैं। पर खुद अपनी पत्नी सहित राज्य त्यागने का निश्चय कर चुके श्री राम के जीवन में ऐसा क्या हुआ कि उनका निश्चय बदल गया। आखिर क्यों वह अपनी पत्नी का परित्याग करने बाले बन गये।अनुरोध करता हूं कि नाटक का अगला अंक जरूर देखने आना।
(नट पर्दे के पीछे चला जाता है।)
दूसरा अंक समाप्त
क्रमशः...
नाटक : सीता परित्याग : अंक ३
(पर्दे के पीछे से नट आता है)
नट : प्रणाम महानुभावों। युगों में श्री राम जैसा कोई पति और माता सीता जैसी कोई पत्नी जन्म लेती है। हर पति पत्नी के मध्य कभी न कभी विवाद होता है। कभी पत्नी मायके जाने की जिद पर और कभी नवीन आभूषण बनाने की जिद के लिये नाराज होती है।
( तभी नटी पर्दे से बाहर आती है।)
नटी : क्या बता रहे हैं स्वामी।
नट : यही कि श्री रात और माता सीता के मध्य कभी विवाद नहीं हुआ।
नटी : नहीं स्वामी, उसके बाद। पति पत्नी में विवाद के क्या कारण बता रहे थे।
नट ( खुद व खुद) : लगता है कि नटी ने मेरी बात सुन ली। अब इसे विवाद करने का एक बहाना मिल गया। (दर्शकों की तरफ) महानुभावों। यह तो घर घर की बात है।
नटी : स्वामी। अपने पति से रूठना तो पत्नी का अधिकार है। पत्नी का रूठना और पति का उसे मनाना यही तो प्रेम है। (दर्शकों की तरफ) मेरी बात सही है ना।
नट : अच्छा। तो जिन पति और पत्नी के मध्य कोई विवाद नहीं होता, उनमें प्रेम नहीं होता है। आदरणीया धर्म पत्नी जी। कुछ माता सीता से सीखो। उन्होंने कभी भी अपने पति श्री राम का विरोध नहीं किया। कभी उनसे कोई विवाद नहीं किया।
नटी : आदरणीय पति देव। लगता है कि आपकी स्मृति थोङा कमजोर हो रही है। या मेरे द्वारा नाटकों का संचालन करते रहने से आप गैर जिम्मेदार होते जा रहे हैं। यदि चार दिन रूठकर मायके चली गयी तो आप तो हमारे अच्छे नाटकों का संचालन भी न कर पायेंगें। लगता है कि आज का अंक आपको भी दर्शकों के साथ बैठकर देखना चाहिये।
नट : अरी भाग्यवान। गुस्सा तो आपकी नाक पर रखा रहता है। वैसे मैं इतना भुलक्कड़ भी नहीं हूं। बस जब आप गुस्सा होकर दिखाती हो और फिर मैं आपको मना लेता हूं। यही तो मेरे प्रेम का तरीका है।
नटी : सभी आगंतुकों को प्रणाम। आज का अंक थोङा विशेष होने जा रहा है। आज एक साथ ऐसे कई बातों का मंचन होगा जो माता सीता व प्रभु श्री राम के जीवन में प्रथम बार हुआ। कभी भी अपने पति से नाराज न होने बाली माता सीता आज अपने पति से नाराज होंगी। हमेशा अपने पति की आज्ञा मानती रहीं माता सीता आज अपने पति के आदेश को भी अनसुना कर देंगीं। मंचन थोङा बड़ा हो सकता है। थोङा अधिक समय लग सकता है। इसके लिये पहले से ही क्षमा मांग रही हूं।
(नट और नटी दर्शकों को अभिवादन कर पर्दे के पीछे चले जाते हैं। पर्दा उठता है। एक कक्ष का दृश्य है। कक्ष अच्छी तरह सूसज्जित है। बैठने के लिये कुछ आसन भी रखे हैं। कक्ष के एक तरफ महिलाओं के श्रंगार की मेज है। जिसपर एक दर्पण लगा हुआ है। राम और सीता दोनों आसनों पर बैठे हुए हैं। सीता की भाव भंगिमा से लग रहा है कि वह कुछ नाराज हैं।)
सीता : महाराज। मजाक का एक समय होता है। हर बात को मजाक में नहीं उड़ाया जा सकता है।
राम : सीते। अब मजाक करने लायक बचा ही क्या है।
सीता : महाराज। मैं केवल आपकी धर्म पत्नी ही नहीं हूं। बल्कि मैं अवध देश की रानी भी हूं। रानी होने के नाते प्रजा की समस्या जानना मेरा अधिकार है तथा प्रजा की समस्या दूर करना मेरा कर्तव्य। कल आप प्रजा के मध्य में घूमकर आये हैं। पर मेरे इतना पूछने पर भी आप मुझे कुछ नहीं बता रहे हैं। इसको मैं मजाक क्यों न सोचूं।
राम : सीते। आप भी व्यर्थ में पीछे पड़ जाती हो। मैने बताया तो कि सब ठीक है। प्रजा आनंद में है। जो थोड़ी बहुत समस्या पता चली, उनका भी निदान कर दिया जायेगा।
सीता : महाराज। वह क्या रहस्य था जिसे गुप्तचर बता नहीं पाया। आखिर शासक होने के कारण वह तथ्य जानना अति आवश्यक है। अनेकों बार जनता की बातें राजा के समक्ष नहीं आ पातीं। राजा वही सत्य समझाता है जो उसके समक्ष है। इसीलिये राजा को बार बार प्रजा के मध्य गुप्त तरीके से जाना चाहिये। पर आप उस रहस्य के विषय में एकदम शांत हैं।
राम : सीते। राजा का प्रजा के लिये कितना कर्तव्य है। उसका खुद का भी एक जीवन है। फिर प्रजा की हर इच्छा पूरी करना भी संभव नहीं है।
सीता : महाराज। यह आप क्या कह रहे हैं। चक्रवर्ती महाराज दशरथ के पुत्र और मिथिला नरेश के जामाता के लिये इस तरह सोचना भी गलत है। राजा कर्त्तव्य पथ पर चलता वह संत है जिसका अपना कुछ भी नहीं होता है। प्रजा के लिये दिन और रात राजा उसी तरह लगा रहता है, जैसे एक पतिब्रता स्त्री अपने पति की सेवा में लगी रहती है। जिस तरह एक माता अपने शिशु के पालन पौषण में खुद को भी भूल जाती है। बहुत क्या कहें, प्रजा की सेवा करना ही एक राजा की पूजा है।
राम : सीते। बहुत बड़ी बड़ी बातें न करो। राजा एक मनुष्य ही है। राजा का मन भी कभी प्रसन्नता से भरता है। कभी राजा भी दुख के समुद्र में डूबता है। मानवीय विकारों को भला कौन जीत सकता है।
सीता : हाॅ महाराज। राजा भी खुश होता है। जब राजा अपनी प्रजा को खुश देखता है तो उसका मन मयूर नृत्य करने लगता है। जब प्रजा किसी तरह दुखी होती है तो राजा का अन्तर्मन रोने लगता है। जब तक प्रजा के कष्ट को राजा दूर न कर दे, तब तक भूख, प्यास और नींद को भी भूल जाता है। फिर खुद के परिवार की तो बात ही क्या।
राम : यह तो आदर्श की बातें हैं।। यथार्थ में ऐसा भला कौन कर सकता है। भला कौन राजा प्रजा के लिये खुद के सुख का और परिवार का त्याग कर सकता है।
सीता : महाराज। अवध के महाराज रघु जो आपके आदरणीय पिता दशरथ जी के पितामह थे। एक बार उनके राज्य में अकाल और भुखमरी के हालात पैदा हो गये थे। महाराज रघु ने पूरा राजकोष प्रजा में बांटकर स्थितियां सुधारने का प्रयास किया। फिर उन्होंने अपने राजमहल के सारे सामान, यहाँ तक कि भोजन बनाने व भोजन करने के वर्तन भी बेचकर प्रजा की स्थिति को सुदृढ बनाया था। खुद भूमि पर बिना बिछोने के सोते थे। मिट्टी के बर्तनों में बना भोजन पत्तल पर रखकर खाते थे। प्रजा के जीवन की रक्षा के बाद शिक्षण संस्थानों व गुरुकुलों के उद्धार के लिये उन्होंने धन के देव कुवेर के साथ युद्ध करने का निश्चय किया था। सुना है कि महाराज कुवेर ने उन्हें इतना धन दिया कि अयोध्या राज्य फिर से सम्पन्न हो गया।
राम : सीते। अपने पूर्वजों का गुणगान करता रहा आज मैं यह कहने की धृष्टता कर रहा हूं। संभव है कि इस कहानी को बहुत बढा चढाकर सुनाया हो। मेने तो अपने जीवन में ऐसा कोई राजा नहीं देखा।
सीता : महाराज। हर बात में व्यर्थ की बहस करना आपको शोभा नहीं देता। इस समय भी धरती पर एक ऐसे राजा हैं जिन्होंने प्रजा के दुख को देखकर आपना राजमहल अपनी पत्नी सहित त्याग दिया था। वर्षों प्रजा के साथ रहे। उन्हीं के साथ उन्हीं की तरह खेती करते रहे। ताकि अकाल की आपदा में भी प्रजा खेती करना भूल न जाये। राजा का कर्तव्य प्रजा को कर्तव्यनिष्ठ बनाना है। और जब राजा खुद बढकर उदाहरण प्रस्तुत करे तो प्रजा भला कैसे पीछे रहेगी। परिवर्तन संसार का नियम है। केवल विचार शक्ति ही मनुष्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं। सुख और दुख तो आते जाते हैं। महाराज। मुझे गर्व है कि मैं उन्हीं प्रजापालक राजा मिथिला नरेश सीरध्वज जनक की पुत्री हूं।
राम : सीते। अब मैं आपसे सत्य कहना चाहता हूं। राजमार्ग का पथ अत्यन्त कठिन है। मुझमें वह योग्यता नहीं है कि मैं इस कर्तव्य को निभा सकूं। इसे चाहे आप मेरी कमजोरी कहो। पर सत्य है कि अब मैं राज्य करते करते थक गया हूं। सत्य है कि प्रजा की सारी इच्छा पूर्ण करने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है। मैं अति साधारण व्यक्ति हूं। सीते। इन सबसे दूर जाना चाहता हूं। वहीं जहाँ शांति हो। जहाॅ मुनियों के आश्रम हों। उन्हीं आश्रमों में रहकर जीवन व्यतीत कर देंगें। भरत कुशल शासक रहे हैं। वह अवध का राज्य बहुत अच्छी तरह सम्हाल लेंगें। प्रजा को कोई कष्ट नहीं होगा।
सीता : महाराज। यह आप क्या कह रहे हैं। राजा का भला अपना कौन सा सुख होता है। राजा की अपनी क्या तपस्या। राजा का कुछ भी अपना नहीं होता है, यही तो उसकी तपस्या है।
राम : सीते। अब ज्यादा बहस मत करो। एक बार मान लो कि आपका पति बहुत दुखी है। उसे साधारण तरीके से मुनियों के आश्रमों में रहकर ईश्वर की आराधना करने में ही सुख मिलेगा। फिर आप क्यों उसे बार बार दुखी कर रही हैं। मेने निश्चय किया है कि विद्वान ब्राह्मणों से पूछकर भरत का राजतिलक कराकर खुद आपके साथ वन को चला जाऊंगा। भरत को जब भी किसी परामर्श की जरूरत होगी तो सहर्ष दूंगा। पर अब राज्य नहीं करूंगा।
सीता : पर महाराज।
राम : बस सीते। मैं तुम्हें भी अपने साथ चलने के लिये वाध्य नहीं करूंगा। यदि तुम्हारी इच्छा महल में या अपने पिता के घर रहने की है तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं है। आपको भी सुखद जीवन जीने का पूर्ण अधिकार है।
सीता : महाराज। यह आपने कैसे सोच लिया कि मैं आपके बिना सुख पूर्वक रह पाऊंगी। एक पत्नी का सुख तो पति के सुख में ही है।
राम : तो सीते। अभी थोङी देर राजदरवार में घूम कर आता हूं।
(राम उठकर चले जाते हैं। सीता थोड़ी देर आसन पर बैठी रहती हैं। फिर उठकर टहलने लगती हैं। पर थोङी देर में फिर से बैठ जाती हैं।)
सीता (अपने आप से) :महाराज किस बात से व्यथित हैं। अभी तक प्रजा को अपनी संतान समझते आये महाराज अचानक अपने कर्तव्य से भाग रहे हैं। कल जब से प्रजा के मध्य से वापस आये हैं, इसी तरह की बातें कर रहे हैं। इससे पूर्व तो प्रजा से जुड़ी हर बात मुझे बताते थे। मुझसे हर बात में सलाह लेते थे। अब अचानक इस तरह क्यों। मैं श्री राम की अर्धांगिनी हूं। कह सकती हूं कि वह एक प्रजा वत्सल राजा हैं। भला श्री राम के और मेरे मन में क्या अंतर है। खुद के मन को पहचानने के लिये मुझे किससे पूछने की आवश्यकता है। यदि यह कहा जाये कि हम दो शरीर और एक प्राण हैं तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। मैं केवल श्री राम की भार्या नहीं हूं। अपितु अवध की रानी हूं। मेरा कर्तव्य है कि उस तथ्य का पता करूं जिससे महाराज इस तरह व्यथित हो गये हैं कि खुद राज्य त्यागने को तैयार हैं। प्रजा की ऐसी कौन सी इच्छा है जिसे पूर्ण करने के स्थान पर महाराज अपना पूरा जीवन वन में व्यतीत करना चाहते हैं। ऐसा कौन है जो मुझे सत्य बता सके।
( सीता की दासी रमा का आगमन)
रमा : प्रणाम महारानी। आइये आपका श्रंगार कर दूं।
सीता : रमा। आप तो जानती हो कि हम साधारण तरीके से ही रहते हैं। राजा होकर भी हम कभी भी भोगों में प्रवृत्त नहीं हुए। मैं भी राजकार्य में बहुत समय बिताती हूं। इसीलिये केवल आपको घर के कार्यों में सहायता के लिये रखा है। उसी का मैं आपको वेतन देती हूं। फिर खुद का श्रंगार तो मैं खुद कर सकती हूं।
रमा : महारानी। आप सत्य कहती हैं। वैसे आप जैसी त्यागी स्त्री मेने अभी तक नहीं देखी। सच कहूं तो मैं आपको अपनी स्वामिनी नहीं अपितु अपनी बड़ी बहन मानती हूं। जब बड़ी बहन इतनी मेहनत करती हैं तो छोटी बहन का भी कर्तव्य है कि बड़ी बहन को खुश रखे। देखो आपने तो बाल भी नहीं बनाये। आइये यहां बैठिये। आपके बाल बना देती हूं।
सीता : रमा। तुम्हारा स्नेह ही मुझे बांधे रखता है।
( सीता श्रंगार की मेज के समक्ष बैठ जाती हैं।)
रमा : महारानी। इस मेज की दिशा बदल देनी चाहिये। आखिर दर्शकों को भी पता चले कि मेरी महारानी और बड़ी बहन कितनी सुंदर हैं।
(रमा मेज की दिशा इस तरह बदल देती है कि बैठने के बाद सीता का मुख दर्शकों की तरफ रहे।सीता फिर से बैठ जाती हैं। रमा उनके बालो में कंघी करने लगती है।थोङी देर दोनों में से कोई भी कुछ नहीं बोलता है।)
रमा : महारानी। अब अपनी शक्ल को दर्पण में निहार लें। मुझे तो डर है कि कहीं नजर न लग जाये।
सीता : नजर तो अपनों की ही लगती है। अच्छा रमा। आप मुझे सचमुच अपनी बहन मानती हो या यों ही कहती हों।
रमा : सच कहूं तो आपका यह प्रश्न मुझे बुरा लगा है महारानी। आप निश्चित ही मेरी बड़ी बहन हैं।
सीता : अपनी बड़ी बहन का एक काम करेगी।
रमा : आज्ञा दें महारानी।
सीता : थोङा ऐसा काम है कि मैं सभी पर विश्वास नहीं कर सकती। इसी लिये आपको कह रही हों। पहले वचन दो फिर बोलूंगी।
रमा : महारानी। संसार में सभी को अपने प्राण सबसे ज्यादा प्रिय होते हैं। निश्चित ही मुझे भी। वचन देती हूं कि आपके आदेश का पालन स्वयं के प्राणों की आहुति देकर भी करूंगी।
सीता : रमा। कल से महाराज बहुत उदास हैं। प्रजा की वह क्या इच्छा है जिसे वह पूरा नहीं करना चाहते। आप राजमहल से बाहर जाती हो। पता कर मुझे बताना।
( रमा के हाथों से कंघी गिर जाती है। वह अपने मुंह पर हाथ रखकर बैठ जाती है।)
सीता : अरे ।यह तुम्हें क्या हुआ। तुम्हारा मुस्कराता हुआ चेहरा कैसे कुम्हला गया।
(रमा सीता के चरणों पर हाथ रख लेती है।)
रमा : महारानी। मुझे क्षमा करें। मैं वह बात आपको नहीं बता सकती। ऐसी बात मुंह से निकालने से पूर्व मैं अपनी जिह्वा काट दूंगी।
सीता : रमा। आप मेरी मदद करो। सबसे बढकर हमेशा देश होता है। देश के लिये अक्सर अपने प्रिय संबंधियों के प्रेम की भी आहुति दी जाती है। देश की रानी को यह जानना है कि प्रजा का हित क्या है। महाराज की पत्नी होने के कारण भी मेरा अधिकार है कि महाराज के हित और अनहित का ध्यान रखूं। रमा। मैं अवध की रानी हूं। यदि मैं आदेश दूं तो क्या यह संभव है कि कोई भी मेरे आदेश की अवहेलना कर सके। फिर मेने तो आपसे बड़ी बहन की तरह आग्रह किया है।
(रमा रोने लगती है।)
रमा : महारानी। आप सत्य कह रही हैं। अक्सर कर्तव्य का पालन करना कठिन होता है। फिर भी कर्तव्य निभाना ही होता है। आपके आदेश को मैं तो क्या तीनों लोकों में कोई भी टाल नहीं सकता। पर कुछ क्षण आंसू बहा लेना तो मेरा अधिकार है। महारानी से प्रार्थना करती हूं कि मुझे मेरे अधिकार से वंचित न करें।
( थोङी देर रमा की सिसकियों की आवाज आती रहती है। फिर रमा आंसू पोंछकर उठ खड़ी होती है। तथा सीता के कान के नजदीक अपना मुंह रखकर बताने का अभिनय करती है।)
सीता : रमा ।यह हार अपनी बहन का उपहार समझ कर रख लो। अब आपसे मेरा मिलन भाग्य के आधीन है। इसे देखकर अपनी बहन को याद करते रखना।
( सीता रमा को हार देती है। रमा वह हार दोनों हाथों में लेकर अपने सर से लगाती है। फिर सीता को प्रणाम करती है। और चली जाती है।
सीता कक्ष में घूमने लगती है।)
सीता : (स्वयं से) पत्नी को सहधर्मिणी कहा जाता है। क्योंकि वह पति के धर्म में उसकी संगिनी होती है। इस तरह पत्नी का कर्तव्य अपने पति को धर्म में लगाना है। यह धर्म क्या है। शास्त्र कहते हैं - धार्यते इति धर्मः। वह आचरण, विचारधारा या संस्कार जिन्हें धारण कर मनुष्य इस संसार समर को पार करता है, वही धर्म है। धर्म के अनेकों भेद कहे हैं। एक राजा का धर्म अपनी प्रजा का पालन करना होता है। उसके इस धर्म की राह में कोई भी नहीं आ सकता। न खुद राजा का सुख और न राजा का अपनी पत्नी और पुत्रों से स्नेह।
माना पति की आज्ञा मानना पत्नी का धर्म है। पर पत्नी का मुख्य धर्म तो पति को उसके कर्तव्य पथ पर चलने को प्रेरित करना है। पति को उसके धर्म से भटकाकर उसकी चापलूसी करते रहना तो पतिब्रता बनने का ढोंग करना है।
ठीक है। मान लिया कि पति की आज्ञा मानना पत्नी का धर्म है। तो मैं अधर्म करने को तैयार हूं। युगों तक भीषण नरकों की अग्नि में जलने को तैयार हूं। खुद नरकाग्नि में जलकर अपने पति श्री राम को उनके धर्म की राह पर चलाऊंगी।
पर कैसे कर पाऊंगी। सीता... ।तुम भूल रही हो। तुम अवध की रानी हो। अपने रानी के अधिकार का प्रयोग करो।
(प्रगट में) दरबान। दरबान।
( दरबान भीतर आता है।)
दरबान : प्रणाम महारानी।
सीता : इसी समय महाराज, तीनों राजकुमारों, राजकार्य में निपुण मेरी तीनों बहनों, मंत्री सुमंत्र को संदेश देकर आइये कि महारानी इसी समय अपने कक्ष में आवश्यक गुप्त वार्ता करेंगीं।
दरबान : जो आज्ञा महारानी।
( दरबान चला जाता है।)
सीता ( मन ही मन) :सीता। एक बार फिर से विचार लो। तुम इतना कर पाओंगी।तुम एक स्त्री हो। स्त्री का तो पर्यायवाची भी अबला है।
अरे। मैं भी न जाने क्या सोचने लगती हूं। यदि स्त्री अबला होती तो महिषासुर का वध माता दुर्गा कैसे कर पातीं।
स्त्री सृष्टिकर्ता की वह रचना है जिसके लिये कुछ भी असंभव नहीं। हाॅ मैं स्त्री हूं। पर अबला नहीं। बिना किसी सहारे वह करके दिखाऊंगी कि संसार फिर स्त्री को अबला कहने से पूर्व सोचेगा।
( कक्ष में राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, मांडवी, उर्मिला, श्रुतिकीर्ति व सुमंत्र का आगमन)
सीता : आप सभी आसनों पर स्थान गृहण करें। अचानक यह आपातकालीन मंत्रणा मेने बुलाई है। इसका कारण है कि हमारे अवध देश पर एक बड़ा संकट आया है।
सुमंत्र : महारानी। किस तरह का संकट।
सीता : महाराज की कर्तव्यविमुखता का संकट। बाहरी शत्रु से देश को देश के सैनिक बचा सकते हैं। पर जिस देश का राजा ही कर्तव्यों से पलायन करना चाह रहा हो, उस देश को किसी वाह्य शत्रु की क्या आवश्यकता।
राम : महारानी। मैं खुद को राजा के पद के लिये अयोग्य पा रहा हूं। यह बात मेने आपको बतायी भी है।
सीता : महाराज। आप वही अवध के राजा राम हैं जिनकी राज्य व्यवस्था की दूर दूर देशों तक प्रशंसा होती है। देवताओं तक को आपकी दक्षता देखकर स्पृहा होती है। पर अब आप कमजोर बन रहे हैं। आखिर आपको क्या अधिकार है कि अपनी स्त्री को प्रजा से अधिक प्रेम करें।
राम : महारानी। इसे मेरी दुर्बलता कह लो। मैं खुद को दुर्बल स्वीकार करता हूं।
सीता : बहुत अच्छा महाराज। आपको कौन दुर्बल कहेगा। पुरुष प्रधान समाज हमेशा स्त्री की ही कमी तलाशता है। युगों तक यही कहा जायेगा कि श्री राम तो प्रजापालक राजा थे। पर उनकी स्त्री ने उन्हें कर्तव्य पथ पर चलने नहीं दिया।
राम : नहीं। इस विषय में भी आपको दोषारोपण। यम देव मेरे प्राण क्यों हरण नहीं कर लेते।
सीता : महाराज। सत्य कड़वा होता है। स्त्रियाँ तो हमेशा दोष सहन करने की आदी होती हैं। मैं अवध की महारानी सीता इसी समय निर्णय लेती हूं कि मैं अभी तुरंत राजमहल त्यागकर अज्ञात स्थन पर चली जाऊंगी। इतनी दूर कि महाराज मेरे प्रेम में अपने कर्तव्यपथ को न भूलें।
( कक्ष में अनेकों रुदन के स्वर उठते हैं।)
राम : महारानी। आप अवध की एकमात्र शासिका नहीं हैं। मैं भी आपके साथ अवध का संयुक्त शासक हूं। जिस तरह बिना आपकी सहमति मुझे कोई भी निर्णय लेने का अधिकार नहीं है, ठीक उसी तरह आपको भी बिना मेरी सहमति यह निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है।
सीता : महाराज। जब तक मैं और आप बराबर रूप से सबल थे, यह उस समय की बात है। इस समय आप एक कमजोर राजा हैं तो वहीं मैं निश्चित ही आत्मबल से युक्त सशक्त रानी।ऐसी स्थिति में तो सशक्त रानी का निर्णय ही मान्य होगा।
राम : सीता। आपको तर्कों में कोई नहीं हरा सकता। फिर भी आप मेरी धर्म पत्नी हैं। आपका धर्म अपने पति के निर्णय में पति का साथ देना है।
सीता : महाराज। पत्नी धर्म की संगिनी होती है। वास्तव में तो जीव अकेला ही पथिक है। फिर किसी का भी साथ केवल धर्म का ही हो सकता है। (लक्ष्मण की तरफ देखकर) लक्ष्मण। अभी रथ तैयार करो। मैं अभी राजमहल से चलूंगी।
लक्ष्मण : भाभी... ।(रोने लगते हैं।)
सीता : लक्ष्मण। इस समय मैं आपकी भाभी नहीं अपितु अवध की रानी आदेश दे रही हूं।
लक्ष्मण : जी महारानी।
(लक्ष्मण कक्ष से बाहर निकल जाते हैं।)
सीता : महामंत्री सुमंत्र जी।
सुमंत्र : आज्ञा महारानी।
सीता : मेरे बाद महाराज खुद को राजकार्य में अकेला महसूस न करें, इसलिये उन्हें समय समय तक उचित सलाह देते रहना। यदि महाराज कभी प्रजा के अहित का कुछ कार्य करें तो उनका विरोध करने में भी पीछे न रहना। राजधर्म के विषय में आप इस समय अवध में सबसे बड़े ज्ञानी हैं।
राम : सीते। एक बार फिर से विचार कर लो। तुम्हारे बिना राम उसी प्रकार है जैसे जल बिन मछली।
सीता : महाराज। अक्सर राज्य हित में राजा और रानी को बहुत कठोर निर्णय लेने होते हैं। भले ही मेरा निर्णय कठोर है पर अवध के हित में है। अभी आप मुझे क्षमा करें।
श्रुतिकीर्ति : महारानी। हमारी भी एक याचना है। अवध की महारानी हमारी बड़ी बहन हैं। उनके साथ खेलते हुए हमारा बचपन बीता है। क्या महारानी हमें आज्ञा देंगीं कि हम उन्हें गले लगाकर अपने अश्रु बहा सकें।
(सीता सर झुकाकर अनुमति देती हैं। मांडवी, उर्मिला और श्रुतिकीर्ति तीनों एक साथ सीता के गले लग जाती हैं और रोने लगती हैं। सीता वैसे तो मौन हैं पर बारंबार अपनी आंखों से आंसू पोंछ रही हैं। भरत और शत्रुघ्न दोनों सीता को प्रणाम करते हैं। सीता धीरे धीरे चलने लगती हैं।)
राम : सीते। मुझे छोड़कर मत जाओ। रुक जाओ सीते।
(राम भूमि पर गिर जाते हैं तथा मूर्छित होने का अभिनय करते हैं। सीता धीरे धीरे चलते हुए कक्ष से बाहर चली जाती हैं। पर्दा गिर जाता है। पर्दे के पीछे से नट बाहर आता है।)
नट : नाटकों का मंचन करते हुए अनेकों बार रोने का मेने अभिनय किया है। पर आज मैं कोई अभिनय नहीं कर रहा। इस समय मेरे गाल पर उपस्थित अश्रु बूंदें वास्तव की हैं। अभी भी एक प्रश्न तो है। महारानी सीता ने रानी होने का धर्म तो निभा दिया। उनके अनुसार उन्होंने पत्नी होने का धर्म भी निभाया है। पर प्रीति में तो अनेकों प्राण त्याग देते हैं। महाराज दशरथ ने भी श्री राम के प्रेम में अपने प्राण त्याग दिये थे। फिर श्री राम तो माता सीता के नित्य प्रेमी हैं। तो माता सीता ने प्रभु श्री राम के प्राणों की रक्षा किस प्रकार की। निश्चित ही माता सीता एक महान नारी थीं। महान लोगों का हर कार्य महान होता है। हमारा प्रयास कुछ प्रश्नों के उत्तर आगामी अंकों के मंचन में देने का रहेगा।
(नट दर्शकों को अभिवादन कर पर्दे के पीछे चला जाता है।
तीसरा अंक समाप्त..
क्रमशः...
नाटक : सीता परित्याग : अंक ४
(नैपथ्य से रुदन का स्वर। पर्दे के पीछे से नट आता है।)
नट : आदरणीय महानुभावों। आप सभी को मेरा प्रणाम। । माता सीता तो राजमहल त्याग कर चली गयी हैं। पर कहीं प्रभु श्री राम प्रेम पर अपना जीवन न त्याग दें। अवध के राजमहल में उपस्थित प्रत्येक मनुष्य आज रो रहा। व्यक्ति कहना तो छोटा शव्द है। वास्तव में तो यहाँ की प्रकृति ही रो रही है। आज ज्यादा बता पाने में असमर्थ हूँ। खुद ही देख लीजिये।
(नट पर्दे के पीछे चला जाता है। पर्दा उठता है। कक्ष में एक शैय्या पर राम लेटे हैं। उनके मुख से कराहने की आवाजें आ रही हैं। कक्ष में कौशल्या, कैकेई, सुमित्रा, भरत, शत्रुघ्न, मांडवी, उर्मिला, श्रुतिकीर्ति व सुमंत्र उपस्थित हैं।)
राम : अरे निष्ठुर राजकर्तव्य ।एक पति को उसकी पत्नी से अलग करने के बाद भी तुम्हें लज्जा नहीं आती। मेरी सीता.. ।गुणों की खान। उसने हमेशा मेरी बात मानी। पर रानी का धर्म निभाते निभाते पत्नी का धर्म भूल गयी। कभी मेरे दर्द को खुद में अनुभव कर लेनी बाली मेरी सीता इतनी निष्ठुर हो गयी कि यह भी न समझ पायी कि उसके बिन मेरा क्या जीवन। पर आशा बड़ी बलवती है। जब तक लखन वापस न आ जायें, मेरे प्राण मेरा शरीर भी नहीं त्याग सकते। मेरी दशा से द्रवित होकर सीता वापस आ सकती हैं। सीता का संदेश सुने बिना मेरे प्राण पखेरू भी नहीं उड़ेंगें।
कौशल्या : पुत्र राम। आप ज्ञानियों में श्रेष्ठ रहे हो। मेरे प्राणों का आधार हो। यदि रघुकुल कोई मनुष्य माना जाये तो उसके तुम्हीं प्राण हों। हमेशा पुत्र माता को धैर्य प्रदान करते हैं। आज वह समय आ गया है कि एक माॅ अपने पुत्र को धैर्य प्रदान कर रही है। पुत्र... ।तुम्हारे बिना मेरा क्या जीवन।
राम : माता ।मैं बड़ा अभागा हूॅ। हमेशा आपके दुख का कारण बना। पहले भी आप सभी को रोता छोड़ वन चला गया था। अब जीवन ही त्यागने बाला हूं।
(कौशल्या, कैकेई और सुमित्रा तीनों रुदन करने लगती हैं।)
उर्मिला : महाराज। आप रिश्ते में मेरे जेठ के अतिरिक्त मेरे बड़े जीजा जी में हैं। आज तक आपसे जेठ के रिश्ते के कारण संकोच करती आयी मैं आज कुछ कहना चाहती हूं। जीजा जी। आप हिम्मत रखें। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपके छोटे भाई व मेरे स्वामी दीदी को समझा कर वापस ले आयेंगें। फिर यदि दीदी अवध आने को तैयार न हुईं तो निश्चित ही वे उन्हें मिथिला तक तो पहुंचा कर आयेंगें। मिथिला में पिता जी और माता जी भी अकेले ही हैं। वहीं उनके साथ उनका पुत्र बनकर वे जीवन व्यतीत कर देंगीं। हम बहनें भी समय समय पर उनसे मिल सकेंगीं।
राम : उर्मिला। आप बचपन से ही सीता के साथ रही हो। पर एक स्त्री के मन में क्या हो सकता है, इसका ज्ञान उसके पति से अधिक किसी को नहीं होता। इसीलिये मन में भय लगा हुआ है। क्योंकि मैं जितना अपनी सीता को जानता हूँ, वह तो कुछ अलग सोचने पर विवश कर रहा है। सीता कोई भी काम केवल खुद के लिये नहीं करती हैं। उनके प्रत्येक आचरण का आधार समाज होता है। इस समय वह न केवल एक रानी का कर्तव्य पूर्ण कर रही है, अपितु नारियों में चेतनता लाने के लिये अग्रसर है। केवल नारियों को सम्मान दिलाने के लिये उन्होंने अपना सुख त्याग दिया है। फिर केवल यह विचार कर लेना कि सीता अवध से नाराज होकर अपने मायके में चली जायेगी, सीता को बहुत कम करके आंकना है। सीता ने अपने रानी होने के कर्तव्य के लिये यह राजमहल त्यागा है। सीता राजमहल त्याग कर भी अवध की रानी हैं। फिर एक बार गहराई से विचार करो कि सीता किस तरह से मिथिला जा पायेंगी।
उर्मिला : जीजा जी। अब समझ आया कि आपको और दीदी को क्यों दो शरीर और एक प्राण माना जाता है। बचपन से ही दीदी के साथ पली बढी मैं उनको इतना कम जानती हूं। आप धन्य हैं। आपका पत्नी प्रेम धन्य है।
राम : उर्मिला ।मेरी सीता एक साथ अनेकों दायित्वों का निर्वहन करने में समर्थ है। वह जानती है कि मेरा जीवन उसी के साथ पर निर्भर है। एक पत्नी होने के नाते वह मेरा जीवन भी बचायेगी।
( लक्ष्मण का प्रवेश।)
लक्ष्मण : अरे दुख का विषय है। जिन सीता भाभी ने मुझे अपने पुत्र के समान स्नेह दिया, आज मैं उन्हें वन में छोड़ आया। हमेशा माता से अपनी बात मनबाता आया उनका पुत्र अवध की रानी से अपनी बात नहीं मनबा पाया। अवध की रानी के आदेश को भला कौन टाल सकता है। न तो मैं भाभी को अयोध्या वापस ला पाया और न उन्हें मिथिला तक पहुंचा पाया। यह सत्य है कि माता सीता आज भी अवध की शासिका हैं। फिर एक शासिका अपनी प्रजा से बहुत दूर क्यों जायेंगी। प्रजा के मध्य गुप्त तरीके से रहकर प्रजा का ध्यान रखेंगी। पर उनका यह कथन भी सत्य लगता है कि स्त्री अबला नहीं अपितु सबला है। बिना किसी सहारे के न खुद का जीवन व्यतीत कर सकती है, अपितु अपनी संतान को पाल सकती है। उसे सुशिक्षित और सुसंस्कारित कर सकती है। सत्य बात तो यह है कि संसार यह गलत जानता है कि लक्ष्मण खुद बड़ा संयमी है। उसने चौदह वर्षों तक निद्रा, भूख और प्यास पर नियंत्रण रखा। सत्य तो यह है कि जिस तरह एक रंगमंच पर अभिनेता के अभिनय के अतिरिक्त पार्श्व में सूत्रधार की भूमिका होती है, वही रंगमंच को सफल बनाता है, उसी तरह मेरे उस तप के पार्श्व में मेरी पत्नी उर्मिला का योगदान है। जिनके बिना कभी यह असंभव कार्य संभव न होता।
राम : आ गये लक्ष्मण। तुम्हारी भाभी वापस नहीं आयेंगी। वह मिथिला भी नहीं जायेंगी। यह मैं जानता था। जल्द बताओ कि सीता ने मेरे प्राणों की रक्षा के लिये क्या उपाय किया है। अब मेरे प्राण शरीर से निकलना ही चाहते हैं।
लक्ष्मण : हाॅ भैय्या। भाभी ने आपके लिये यह पत्र लिखा है। वह कह रहीं थीं कि यह पत्र नहीं अपितु मेरे स्वामी का जीवन है। इसे सुरक्षित आप तक पहुंचा दूं।
राम : लक्ष्मण। अभी मैं पूर्ण स्वस्थ नहीं हूं। इस पत्र के वचनों को मुझे उसी तरह सुनाओ जैसे एक वैद्य किसी रोगी को औषधि देता हूं।
लक्ष्मण : जी भैय्या।
(लक्ष्मण पत्र खोलने व उसे पढकर सुनाने का अभिनय करते हैं।)
लक्ष्मण :मेरे प्राणेश्वर। अक्सर राजधर्म बहुत कठोर होता है। आपको असहाय स्थिति में छोड़कर चली गयी, मेरी इस निर्दयता को क्षमा करें।
स्वामी। खुद के लिये तो पशु पक्षी जीते हैं। मनुष्य तो वही होते हैं जो समाज के लिये अपना जीवन भी दाव पर लगा दें। जल का भंडार नदी कभी भी खुद जल नहीं पीती।
फिर राजा का तो धर्म वैसे भी सबसे कठिन कहा है। केवल प्रजा की सेवा करना ही राजा का धर्म है।
स्वामी। वैसे हम दोनों अभिन्न हैं। हमारा कभी वियोग हो ही नहीं सकता। फिर भी हमारा साथ आपको राजा के कर्तव्यों से दूर कर रहा था। तथा हमारा यह भौतिक वियोग आपको महानतम तपस्वियों से भी बढकर बनायेगा।
स्वामी। मैं आसानी से अवध की प्रजा के समक्ष अग्निपरीक्षा लेकर सुखपूर्वक राजमहल में रह सकती थी। पर यह एक गलत परिपाटी की शुरुआत होती। इतना प्रयास करने के उपरांत भी आज भी पुरुषों के मन में नारियों के लिये अभीष्ट सम्मान नहीं है। सत्य तो यह है कि पुरुष के मन में बसे पुरुषत्व के अहंकार कौ नष्ट करना खुद ईश्वर के वश में नहीं है। इसके लिये पुरुष को अधिक दोष भी नहीं दिया जा सकता है। उसे ईश्वर ने उन विशिष्ट गुणों से बंचित कर रखा है जिन्हें स्त्री को प्रदान किया है। इसीलिये एक स्त्री दूसरे घर को अपना बना सकती है। अपनी संतान के लिये खुशी खुशी अपार दर्द सहन कर सकती है।
अवध की प्रजा के मध्य अग्निपरीक्षा ले लेने से मेरा जीवन सुखद हो जाता। आप यह भली प्रकार जानते भी हैं कि अग्नि भी मेरे शरीर को स्पर्श कर चंदन की भांंति शीतल ही रहती। पर विश्व की नारियों का पहले से ही इतना दुखी जीवन और दुखी हो जाता।
स्वामी। वैसे तो रघुकुल सत्यवादिता के लिये विख्यात है। सत्य के लिये आपके कुल में अनेकों ने अपने प्राण तक दाव पर लगा दिये। पर यह सिद्धांत खुद के जीवन के लिये है। एक राजा का धर्म खुद के लिये किये जाने बाले धर्म से बहुत अलग होता है। बहुधा प्रजा के हित के लिये प्रजा के मध्य कुछ मिथकों का प्रचार राजनीति का अंग है। यदि प्रजा में यह सत्य फैला कि मैं स्वयं राजमहल त्याग कर चली गयी हूं, तो प्रजा में अराजकता की स्थिति आ जायेगी। संभव है कि गृहयुद्ध की स्थिति भी बन जाये। इसलिये प्रजा के मध्य यह मिथक प्रचारित रहना कि आपने मेरा परित्याग कर दिया है, यही वर्तमान राजनीति की मांग है।
मेरे प्राणेश्वर। हमारा न वियोग हुआ है और न हो सकता है। आपकी धर्म पत्नी होने के नाते और अवध की रानी होने के नाते नित्य आपके स्वप्न में आऊंगी। जब संसार निद्रा में मग्न होगा, उस समय स्वप्न देवी के सानिध्य में हमारा मिलन होगा। अवध की रानी होने के कारण मेरा विशेषाधिकार अभी भी है कि मैं प्रजा की समस्या जानूं तथा मेरा कर्तव्य है कि उसका निदान खोजूं। इसलिये मैं रोज आपके स्वप्न में आती रहूंगी।
आपके गुणों से प्रेम करने बाली
आपकी सीता।।
(राम शैय्या से खड़े हो जाते हैं। लक्ष्मण के हाथ से पत्र लेकर अपने सीने से लगा लेते हैं।)
राम : सीते। आपका यह पत्र केवल पत्र ही नहीं है। अपितु मेरा जीवन है। आपकी इस बात पर कि हम नित्य स्वप्न में मिलेंगे, अविश्वास करने का कोई कारण ही नहीं है।सीते...। अपने पति को कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर कराना, रानी का कर्तव्य निभाना, विश्व की सारी स्त्रियों के विषय में विचार करना तथा अपने पति के जीवन की रक्षा करना, सब कुछ एक साथ, केवल आपके लिये ही संभव है। विश्व में कीर्ति की कामना किसे नहीं होती। चरित्र से हीन व्यक्ति भी अपने चरित्र पर कोई कलंक नहीं चाहता है। अभी तक स्त्रियों को ही कलंकित करते रहा यह पुरुष प्रधान समाज देखेगा कि किस तरह एक पुरुष भी अपने चरित्र पर कलंक स्वीकार कर सकता है। सीते। आपसी इच्छा का मैं सम्मान करूंगा। आपसे असीम प्रेम करने बाला मैं स्वयं आपके परित्याग का कलंक स्वीकार करूंगा। पर अपने राजा के कर्तव्यों से कभी पीछे नहीं हटूंगा।
( राम एक बार फिर से पत्र को अपने सीने से लगा लेते हैं। पर्दा गिर जाता है। पर्दे के पीछे से नट और नटी का आगमन)
नट : महान लोगों। माता सीता और प्रभु श्री राम के चरित्र का मंचन किसी के वश की बात नहीं है। यह तो तभी संभव होता है, जब वे ही खुद कृपा करें।
नटी : अनेकों युगों में कोई एक मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जन्म लेते हैं। तथा अनेकों युगों में कोई एक प्रेम और त्याग की साक्षात मूर्ति माता सीता के रूप में जन्म लेती हैं। जहाॅ सारे ज्ञानों का अंत होता है, वहीं से प्रभु श्री राम और माता सीता का चरित्र आरंभ होता है। प्रभु श्री राम और माता सीता के चरित्र का मंचन करने की छोटी सी कोशिश की है।
( नट और नटी दर्शकों को प्रणाम कर पर्दे के पीछे चले जाते हैं।)
समाप्त...
पाठकों के लिये विशेष :
(१) यह मेरी मौलिक रचना है। तथा इसका आधार भी माता सीता और प्रभु श्री राम के अनुग्रह से मेरे ही द्वारा पहले लिखी कहानी सीता परित्याग व सीतायन महाकाव्य है।
(२) प्राचीन नाटकों में नट और नटी नाटक का एक आवश्यक अंग होते थे। नट और नटी न केवल स्वयं अभिनय करते थे, अपितु नाटक के जिन तथ्यों को दृश्य व संवादों के माध्यम से भी दर्शकों तक प्रस्तुत करना असंभव हो, उन्हें आपसी संवाद से प्रस्तुत करते थे। आधुनिक काल में नट और नटी नाटकों से लुप्त हो गये हैं। पर इस गंभीर विषय पर नाटक लिखते समय मुझे नट और नटी का प्रयोग अति आवश्यक लगा। वैसे सिनेमा को रंगमंच की अगली पीढी माना जाता है। बहुचर्चित फोगाट बहनों पर बनी फिल्म दंगल में भी फोगाट बहनों के चचेरे भाई की भूमिका बहुत हद तक प्राचीन नाटकों के नट की भूमिका के समान ही है।
(३)आधुनिक नाटकों में दृश्यों के वर्णन व पात्रों की वेशभूषा पर बहुत वर्णन करने का चलन है। मेरे विचार से नाटक वह विधा है जो रंगमंच पर अभिनीत हो सके। इसलिये दृश्यों का उतना ही उल्लेख किया गया है जितना अति आवश्यक लगा। परिस्थिति, रंगमंच मंडली की सामर्थ्य व उनके पास उपलब्ध तकनीकी के आधार पर दृश्यों व वेशभूषा में विभिन्न प्रकार से बदलाव हो सकता है।
(४)प्रायः नाटक के एक अंक का मंचन एक दिन में किया जाता है। पर अनेकों बार परिस्थिति के अनुसार पूरे नाटक का या नाटक के अनेकों अंकों का मंचन एक ही दिन में संभव है। ऐसी स्थिति में नट और नटी के संवादों में आवश्यक बदलाव आवश्यक व अपरिहार्य होगा।
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'
ईमेल : diwashanker@gmail.com

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