बड़े ही चाव से
मैं 
बुनती रहती निरन्तर
भावों के 
रजत मानिंद धागों से
रेशमी घरौंदा
ताकि रह सकूं
पुरसुकून
जीवन भर उसमें
पर यह क्या
आभास भी नहीं हुआ मुझे
कि मैं कब फंस गई 
अपने ही द्वारा बुने मकड़जाल में
अब मैं 
उसकी गिरफ्त से दुनिया की खूबसूरत तस्वीर
देख तो सकती हूं
पर 
इस रेशमी बन्धन से मुक्त नहीं हो सकती
उस पंक्षी की तरह
जो स्वर्ण सलाखों में कैद
मुक्त आकाश की सैर करने को
व्याकुल
पंख फड़फड़ाता है
जलता हुआ
अपनी तकदीर से बगावत करता है
पर द्वार खुलने पर बाहर नहीं जाता
क्योंकि
वह मोह पास में जो बंधा होता है
जिसे वह चाहकर भी नहीं तोड़ सकता।।


                देवयानी भारद्वाज
               उसायनी फीरोजाबाद